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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 788 में से

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पृष्ठ 35

निर्गुण भक्ति आन्दोलन की परम्परा हमारी परम्परा है। आधुनिक काल में राधामोहन
गोकुलजी, राहुल सांकृत्यायन और भगतसिंह की विकासमान वैज्ञानिक भौतिकवादी
चिन्तन-परम्परा भी हमारी परम्परा है। और यह परम्परा अत्यन्त समृद्ध है। हम तो
यहाँ मात्र कुछ सर्वाधिक आलोकमय शिखरों का नामोल्लेख कर रहे हैं। पूरी दुनिया
के साथ ही, अपने देश की इस क्रान्तिकारी विरासत का पुनःस्मरण आज के नये
सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन का आवश्यक कार्यभार है। इतिहास कोई जड़वस्तु
नहीं होती। जब भी भविष्य-सन्धान का नया कार्यभार सामने आता है, जब भी नये
सिरे से मुक्ति-परियोजनाओं का निर्माण करना होता है तो एक बार फिर इतिहास
का अन्वेषण करना होता है। भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण कृतित्व का
अध्ययन इसीलिए आज उनके लिए बहुत ज़रूरी है जो जन-मुक्ति की नयी
परियोजना तैयार करने और उसे क्रियान्वित करने के लिए संकल्पबद्ध हैं।
इन पत्रों-दस्तावेज़ों का अध्ययन करते हुए एक बात का ध्यान रखना बेहद
ज़रूरी है। इनका अध्ययन इनके कालक्रम को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
भगतसिंह को समय ने अपने विचारों को सुस्थिर-सुनिश्चित करने का समय ही
नहीं दिया। उनका पूरा चिन्तन एक तूफ़ानी गति वाली विचार-यात्रा है, जिसमें
क्रान्तिकारी जीवन के अनुभवों के समाहार तथा दर्शन, साहित्य, क्रान्तियों के
इतिहास आदि के धुआँधार अध्ययन के बाद, लगातार, बहुत तेज़ी से परिवर्तन आते
गये हैं। लगातार वह ज़्यादा से ज़्यादा वैज्ञानिक दृष्टि-सम्पन्नता की दिशा में आगे
बढ़ते गये हैं, उनका चिन्तन ज़्यादा से ज़्यादा अन्तरविरोध-मुक्त होता गया है तथा
उनकी विश्लेषण पद्धति ज़्यादा से ज़्यादा द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी होती गयी है।
भगतसिंह ने अपना पहला लेख पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या पर
सत्रह वर्ष की अवस्था में लिखा। तब उनका क्रान्तिकारी जीवन शुरू हो चुका
था और वह कानपुर में 'प्रताप' में काम कर रहे थे। 1928 में एच.एस.आर.ए.
के गठन के समय तक उनकी और उनके साथियों की समाजवाद के प्रति रूमानी
प्रतिबद्धता उत्पन्न हो चुकी थी और सशस्त्र कार्रवाइयों के साथ-साथ युवाओं के
खुले जन-संगठन और जनान्दोलन को भी वे ज़रूरी मानने लगे थे। क्रान्तिकारी
जीवन के अनुभवों, गहन अध्ययन तथा सोहन सिंह जोश और लाला छबील दास
के साथ लगातार सम्पर्क-संवाद ने धीरे-धीरे वैज्ञानिक समाजवाद के प्रति उनकी
समझदारी को और गहरा बनाने का काम किया। कानपुर-प्रवास के दौरान
राधामोहन गोकुलजी और सत्यभक्त आदि के विचारों ने तथा वहाँ के मज़दूर
आन्दोलन ने भी मध्यवर्गीय सशस्त्र क्रान्तिवाद को सर्वहारा क्रान्ति की समझ की
दिशा में मोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। जेल में काफ़ी संघर्ष के बाद
लिखने-पढ़ने की सुविधा भगतसिंह को सितम्बर 1929 को मिली। उसके बाद,
मुक़दमे के बयानों की तैयारियों, जेल के बाहर के साथियों से सम्पर्क-संवाद
भगतसिंह की वैचारिक विरासत और हमारा समय / 29