भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 32, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंमानवतावादी व्यक्ति हैं। लेकिन ऐसी दयालुता से सामाजिक तब्दीली नहीं आती,
उसके लिए वैज्ञानिक और गतिशील सामाजिक शक्ति की ज़रूरत है।" 2 फ़रवरी,
1931 के अपने लम्बे लेख में उन्होंने फिर लिखा, "हमें कांग्रेस आन्दोलन की
सम्भावनाओं, पराजयों व उपलब्धियों सम्बन्धी किसी क़िस्म का भ्रम नहीं होना
चाहिए। आज के इस आन्दोलन को गाँधीवाद कहना ठीक है...इसका तरीक़ा अनूठा
है, लेकिन इसके विचार बेचारे लोगों के किसी काम के नहीं हैं। गाँधीवाद साबरमती
के सन्त को कोई स्थायी शिष्य नहीं दे पायेगा।" लेकिन साथ ही व्यापक जनता
को लामबन्द कर लेने में गाँधी की सफलता का वे वस्तुपरक मूल्यांकन भी करते
हैं, "इस तरह गाँधीवाद अपने भाग्यवादी मत के बावजूद क्रान्तिकारी विचारों के
क़रीब पहुँचने की कोशिश करता है, क्योंकि वह जन-कार्रवाई पर निर्भर करता है,
चाहे यह कार्रवाई जनता के लिए नहीं है।"
एक ओर जहाँ एच.एस.आर.ए. ने जनता को जगाने और अपने उद्देश्यों के प्रचार
के लिए कुछ व्यक्तिगत आतंक की कार्रवाइयों को पूर्ववर्ती क्रान्तिकारी संगठनों की
ही भाँति अंजाम दिया, वहीं मज़दूर क्रान्तियों और जन-संघर्षों के इतिहास और
क्रान्तिकारी आन्दोलनों के अनुभवों के समाहार के आधार पर भगतसिंह और उनके
साथी ज़्यादा से ज़्यादा इस निष्कर्ष पर पहुँचते जा रहे थे कि क्रान्ति अपनी निर्णायक
मंज़िल में अनिवार्यतः सशस्त्र और हिंसात्मक होगी, लेकिन मज़दूरों-किसानों-
छात्रों-युवाओं के खुले जन-संगठन बनाये बिना और व्यापक जनान्दोलनों के बिना
क्रान्ति की तैयारियों को निर्णायक मंज़िल तक पहुँचाया ही नहीं जा सकता। इस
सोच की शुरुआती अभिव्यक्ति हमें 'नौजवान भारत सभा' के गठन में देखने को
मिलती है और जेल-जीवन के अन्तिम वर्ष तक मार्क्सवाद-लेनिनवाद के गहन
अध्ययन (जिसका प्रमाण भगतसिंह की जेल नोटबुक के नोट्स हैं) के बाद
भगतसिंह इस सोच पर एकदम दृढ़ हो चुके थे। 19 अक्टूबर 1929 को पंजाब छात्र
संघ, लाहौर के दूसरे अधिवेशन को भेजे गये अपने सन्देश में भगतसिंह ने लिखा
था : "इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल
उठायें। आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य है।...नौजवानों
को क्रान्ति का यह सन्देश देश के कोने-कोने तक पहुँचाना है, फ़ैक्टरी-कारख़ानों
के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोंपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों
में इस क्रान्ति की अलख जगानी है जिससे आज़ादी आयेगी और तब एक मनुष्य
द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।" फ़रवरी, 1931 के अपने
ऐतिहासिक मसविदा दस्तावेज़ में भगतसिंह ने स्पष्ट कहा था : "आतंकवाद हमारे
समाज में क्रान्तिकारी चिन्तन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है; या एक
पछतावा। इसी तरह यह अपनी असफलता का स्वीकार भी है।...आतंकवाद अधिक
से अधिक साम्राज्यवादी ताक़त को समझौते के लिए मजबूर कर सकता है। ऐसे
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