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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

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सोलहवां बेताल

जीमूतवाहन की कथा

शिशंपा-वृक्ष के पास पहुंचकर विक्रमादित्य ने वृक्ष से बेताल को उतारा और पहले की तरह उसे कंधे पर डालकर मौनभाव से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। रास्ते मे फिर मौन भंग करते हुए बेताल ने कहा—‘‘राजन ! इस बार मै तुम्हें ऐक और दिलचस्प कथा सुनाता हूं, पर शर्त वही रहेगी। ’’

राजा ने सहमति जताने पर बेताल ने इस बार यह कथा सुनाई।

बहुत पहले हिमवान पर्वत पर कंचनपुर नाम का एक नगर था। उस नगर का स्वामी जीमूतकेतु नामक एक पराक्रमी राजा था। राजा के महल के उद्यान में उसके पूर्वजों द्वारा देवताओ से प्राप्त एक कल्पवृक्ष था, जो उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता था। उस देववृक्ष के कारण राजा को धन-धान्य, ऐश्वर्य व वैभव की कोई कमी नहीं रहती थी। उस कल्पवृक्ष की कृपा से ही राजा को जीमूतवाहन नाम का एक पुत्र पैदा हुआ था जो अब युवावस्था में प्रवेश कर चुका था। जीमूतवाहन बहुत दानी था। वह समस्त प्राणियों पर दयाभाव रखता था एवं गुरुजनों की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहता था। जीमूतवाहन क्योकि बोधिसत्व के अश से पैदा हुआ था, अतः उसे अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत भी ज्ञात था !

कुछ समय बाद जीमूतकेतु ने उसे अपना युवराज घोषित किया। प्रजा अपने युवराज को पाकर बहुत खुश हुई। एक दिन राजा के मंत्री ने आकर युवराज जीमूतवाहन से कहा—‘‘युवराज, यह धन-धान्य, यह ऐश्वर्य सब कुछ कल्पवृक्ष के कारण ही है। अतः अपने कुल एवं प्रजा की समृद्धि के लिए इस देववृक्ष का सम्मान करना कभी मत भूलना, यह अजेय है। देवराज इन्द्र भी इसका महत्ता को स्वीकार करते हैं।'

युवराज जीमूतवाहन ने वैसा ही करने का वचन दिया। उसने मन ही मन सोचा—‘‘मेरे पूर्वजों ने इस देववृक्ष का उचित लाभ नहीं उठाया। उन्होंने केवल इससे साधारण स्वार्थ की याचना करके इसे स्वयं तक ही सीमित रखा। इससे न केवल उनका (पूर्वजों) अपितु, इस महात्मा वृक्ष का स्थान बहुत छोटा कर दिया। आखिर संसार में और भी तो मानव रहते हैं। इस देववृक्ष का उपयोग समस्त प्राणिमात्र के कल्याण के लिए होना चाहिए। ’’

ऐसा सोचकर वह अपने पिता के पास पहुंचा और बोला—‘‘पिताश्री, यह तो आप जानते ही हैं कि इस संसार-सागर में शरीर के साथ ही समस्त वस्तुएं लहरों की झलक के समान चंचल हैं। संध्या, बिजली और लक्ष्मी तो विशेष रूप से क्षणस्थायी हैं। देखते-ही-देखते मिट जाने वाली हैं। इन्हें कब किसी ने स्थिर रहते देखा है ?


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