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सर्वकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

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पहुचा। वहां मुनि के कथनानुसार उसकी भेट लक्ष्मीदत्त नामक उस वणिक से हुई,
जो सुवर्णद्वीप जाने की इच्छा रखता था। राजा के पैरों मे चक्र का चिन्ह तथा
राजोचित मुख-मुद्रा आदि देखकर उस वणिक ने उसे प्रणाम किया। राजा उसी के
साथ उसके जहाज पर चढ़कर समुद्र में गया।

जहाज जब बीच समुद्र में पहुंचा, तब जल के भीतर से वही कल्पवृक्ष निकला,
जिसके स्कंध पर वह कन्या को देखने लगा। इसी बीच वह वीणा बजाती हुई, यह सुन्दर
गीत गाने लगी —‘‘मनुष्य, कर्म का जो बीज पहले बोता है, वह निश्चित तौर पर ही
उसका फल भोगता है। पहले किए हुए कर्मों के फल को विधाता भी नहीं टाल सकता।
अतः दैवयोग से जिसके लिए जहा, जो और जैसा भवितव्य (होनहार) है, उसे वह वहीं
और उसी प्रकार प्राप्त करने के लिए विवश है—इसमें कोई संदेह नहीं है।’’

राजा ने जब उसके द्वारा गाया गया वह गीत सुना, जिसमें भवितव्य का संदेश था
तब वह काम-बाणों से आहत होकर, निःस्पंद बना, थोड़ी देर उस कन्या कों देखता रहा।

अनन्तर, वह राजा झुककर इस प्रकार समुद्र की स्तुति करने लगा—‘‘हे रत्नाकर !
हे अगाधहृदय ! तुम्हें नमस्कार है। तुमने इस कन्या को अपने भीतर छिपाकर, विष्णु को
लक्ष्मी से वंचित किया है। जब तुमने पंखों वाले पर्वतों को आश्रय दिया, तब देवता भी
तुम्हारा अंत नहीं पा सके। हे देव, मैं आपकी शरण में आया हूं, मेरी कामना पूरी करो।’’

जब राजा इस प्रकार स्तुति कर रहा था, तभी वृक्ष सहित वह कन्या समुद्र में
विलीन हो गई। यह देखकर राजा भी उसके पीछे-पीछे समुद्र में कूद पड़ा। सज्जन
वणिक लक्ष्मीदत्त ने यह देखकर यही समझा कि राजा निश्चय ही मर गया, इस दुख
से वह भी देह त्याग को उत्सुक हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई, जिसने उसे इस
प्रकार आश्वासन दिया—‘‘ऐसा दुस्साहस मत करो। डूबे हुए इस मनुष्य को समुद्र
में कोई भय नहीं है। तपस्वी वेशधारी इस राजा का नाम यशकेतु है। यह कन्या
पूर्वजन्म की इसकी स्त्री है। यह इसीलिए यहां आया है। अपनी इस स्त्री को प्राप्त
करके यह फिर अंग राज्य में चला जाएगा।’’

यह सुनकर वह व्यापारी अपनी इष्टसिद्धि के लिए अपने अभीष्ट स्थान की ओर चला
गया। उधर, डूबे हुए राजा यशकेतु को उस महासमुद्र में अकस्मात् एक अलौकिक नगर
देखकर बहुत आश्चर्य बहुत आश्चर्य हुआ। वहां, जगमगाती मणियों के खम्बों वाले,
सुवर्ण से चमकती दीवारों वाले और मोतियों की जाली से युक्त खिड़कियों वाले प्रासाद
थे। वहा सरोवर थे, जिनकी सीढ़ियां अनेक प्रकार की रत्न-शिलाओं से बंधी थीं और
उद्यान भी थे, जिनमें कामना पूर्ण करने वाले कल्पवृक्ष थे। इन सबसे वह नगर अत्यंत
शोभित हो रहा था। राजा ने हर घर में जा-जाकर अपनी प्रिया की खोज की किंतु वह उसे
कहीं दिखाई न दी। तब वह एक ऊंचे मणि-भवन पर चढ़ गया और उसका द्वार खोलकर
भीतर जा पहुंचा,! भीतर उसने एक उत्तम रत्नों वाले पर्यंक पर सिर-से-पांव तक चादर
ओढ़े किसी को सोते हुए देखा।

72 ☐ बेताल पच्चीसी