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सर्वकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 151 में से

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यह सुनकर दीर्घदर्शी ने कहा—‘‘फिर मैं यहां ही क्यों रहूं, श्रीमंत। मैं तो
सुखपूर्वक आपके साथ ही चलूंगा।’’ इस पर उस सज्जन वणिक ने कहा—‘‘ठीक
है, यदि आपकी ऐसी ही इच्छा है तो यही करो।’’

बहुत समय बाद दीर्घदर्शी को उसके यहां सोने को नर्म शैय्या मिली थी, इसलिए
वह बिस्तर पर पड़ते ही चैन की नींद सो गया।

अगले दिन वह उस व्यापारी के साथ समुद्रतट पर गया और व्यापारी के सामग्री
से लदे जहाज में बैठ गया। अनेक द्वीपों की यात्रा करता और आश्चर्यजनक एवं
भयानक समुद्र को देखता हुआ, वह सुवर्णद्वीप जा पहुंचा। कहां तो महामंत्री का पद
और कहां समुद्र का लांघना ! किसी ने सच ही तो कहा है—‘अपयश से डरने वाले
सज्जन क्या नहीं करते ?’

दीर्घदर्शी ने उस वणिक निधिदत्त के साथ खरीद-बिक्री करते कुछ समय तक उस
द्वीप में निवास किया।

उस वणिक के साथ जब वह जहाज पर बैठा वापस लौट रहा था, तब उसने समुद्र
की लहर के पीछे उठते हुए कल्पवृक्ष को देखा। उस वृक्ष की शाखाएं मूंगे की तरह सुंदर
थीं। उसके स्कंद सुवर्ण जैसे चमचमाते हुए थे और वह मनोहर मणियों वाले फलों एवं
पुष्पों से शोभित था। उस वृक्ष के स्कंध पर उत्तम रत्नों से युक्त एक पर्यंक पड़ा हुआ था,
जिस पर लेटी हुई एक अद्भुत आकार वाली सुंदर कन्या को उसने देखा।

वह अभी उस कन्या के बारे में सोच ही रहा था कि कन्या वीणा उठाकर एक
गीत गाने लगी, जिसके बोलों का भावार्थ कुछ इस प्रकार था—‘‘मनुष्य कर्म का जो
बीज पहले बोता है, वह निश्चय ही उसका फल भोगता है। पहले किए हुए कर्मों के
फल को विधाता भी नहीं टाल सकता।’’

वह अलौकिक कन्या कुछ देर इस प्रकार गाकर उस कल्पवृक्ष, जिस पर वह लेटी
थी, उस पर्यंक सहित समुद्र में विलीन हो गई। दीर्घदर्शी ने सोचा—‘यहां आज मैंने
यह कैसा अद्भुत और अपूर्व दृश्य देखा। कहां यह समुद्र और कहां दिखकर विलीन
हो जाने वाली गाती हुई अलौकिक स्त्री एवं वृक्ष। ऐसे अनेक आश्चर्यों की खान यह
समुद्र सचमुच वंदनीय है। लक्ष्मी, चंद्रमा, पारिजात आदि भी तो इसी से निकले थे।’

ऐसा सोचकर दीर्घदर्शी अचरज में पड़ गया। यह देखकर नाविकों ने
कहा—‘‘श्रीमंत, आप शायद उस कन्या को देखकर आश्चर्यचकित हो रहे हैं। यह
उत्तम कन्या तो इस प्रकार यहां अक्सर दिखाई पड़ती है। यह दिखाई देती है और फिर
समुद्र में ही विलीन हो जाती है क्योंकि आपने इसे पहली बार देखा है, इसीलिए ऐसा
आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं।’’

‘‘हां, शायद यही बात है।’’ दीर्घदर्शी बोला और उसी दिशा में देखता हुआ
खामोश हो गया।

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