बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
पृष्ठ 48, कुल 151 में से
संदर्भ में पढ़ेंकन्या जब पूजन समाप्त करके मंदिर से बाहर निकली तो उसने अपनी सखी से
कहा—"सखी, जरा जाकर देखो तो मैंने जिन महापुरुष को यहां देखा था, वे कहां है ?
मुझे वह कोई श्रेष्ठ व पूज्य पुरुष महसूस हुए थे, अतः उनसे प्रार्थना करो कि वे यहां पधारें
और हमारा आतिथ्य स्वीकार करें।"
सखी जब राजा चंद्रसेन और सत्त्वशील के पास पहुंची और उन्हें कन्या का संदेश
सुनाया तो चंद्रसेन ने उपेक्षा से कहा—"हमारा इतना ही आतिथ्य बहुत है। अधिक
की कोई आवश्यकता नहीं है।"
कन्या की सखी ने लौटकर जब यही बात उसे बताई तो वह असुर कन्या उससे
मिलने को और भी व्यग्र हो गई। इस बार वह स्वयं उन दोनों के पास पहुंची और उनसे
आतिथ्य ग्रहण करने का निवेदन किया। इस पर राजा चंद्रसेन ने सत्त्वशील की ओर
संकेत करते हुए उस कन्या से कहा—"मैं इनके कहने के अनुसार देवी का दर्शन करने के
लिए ध्वज-मार्ग से यहां आया था। मैंने माता कात्यायनी के परम अद्भुत मंदिर और
उसके बाद तुमको भी देखा। उसके बाद हमें और किस आतिथ्य की आवश्यकता है ?"
यह सुनकर वह कन्या बोली—"तब आप लोग त्रिलोक में अद्भुत मेरे दूसरे
नगर को देखने के लिए कौतूहल से ही मेरे साथ चलिए।" उस कन्या के ऐसा कहने
पर राजा चंद्रसेन ने हंसकर कहा—"इस सत्त्वशील ने मुझे उसके बारे में भी
बतलाया है, वहां पर स्नान करने के लिए एक सरोवर भी है।"
तब उस कन्या ने कहा—"देव, आप ऐसी बात न कहें। मैं यों ही धोखा देने
वाली नहीं हूं। तब फिर, आप जैसे पूज्य को कैसे धोखा दे सकती हूं। मैं आप लोगों
की वीरता के उत्कर्ष से आपकी अनुचरी हो गई हूं। अतः आपको इस प्रकार मेरी
प्रार्थना अस्वीकार नहीं करनी चाहिए।"
असुर कन्या का ऐसा आग्रह सुनकर राजा चंद्रसेन मान गया और वह सत्त्वशील
सहित प्रभा-मंडल के निकट जा पहुंचा। वह कन्या उन्हें किसी प्रकार खुले दरवाजे से
अंदर ले गई, जहां उन्होंने उसके दूसरे अलौकिक नगर को देखा। वह सचमुच एक
विलक्षण नगर था। वहां सभी वस्तुएं सदा वर्तमान रहती थीं। वृक्षों में फूल और फल
बने रहते थे और वह समूची नगरी रत्न तथा सुवर्ण से बनी हुई थी। उस नगरी की
भव्यता ऐसी थी जैसे वे दोनों सुमेरु पर्वत पर आ पहुंचे हों।
असुर कन्या ने एक सुन्दर कक्ष में उन्हें ले जाकर बहुमूल्य रत्न जड़ित सिंहासन
पर बैठाया और अनेक प्रकार से उनका आतिथ्य सत्कार करके अपना परिचय
दिया—"मैं असुरराज कालनेमि की कन्या हूं। मेरे पिताजी की मृत्यु चक्रधारी विष्णु
के चक्र से हुई थी। यहां जरा (वृद्धापन) और मृत्यु की बाधा नहीं होती और सभी
मनोकामनाएं स्वतः ही पूरी हो जाती है।" फिर उसने राजा चंद्रसेन से प्रार्थना
की—"अब आप ही मेरे पिता हैं और इन दोनों नगरों के साथ मैं आपके अधीन हूं।
मेरी प्रार्थना स्वीकार करके आप मुझे अनुग्रहित कीजिए।" इस प्रकार जब उस
बेताल पच्चीसी 49