सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

404 / बन्दी जीवन
जो सर्वथा असफल रहा था । अर्थ-समस्या सुलझाने के लिए सन् 1924 में ही,
अर्थात् श्री शचीन्द्र की गिरफ्तारी से कुछ पहले ही जाली नोट बनाने का भी
प्रयास क्रान्तिकारी कर चुके थे। श्री शचीन्द्र ने 'बन्दी जीवन' के तृतीय भाग में
एक स्थान पर जाली नोट बनाने के सम्बन्ध में थोड़ा आभास दिया है किन्तु यह
नोट कहाँ, कौन बनाता था, यह विवरण रहस्योद्घाटन के भय से नहीं दिया ।
जाली नोट बनाने का काम ढाका अनुशीलन समिति की ओर से पहले ढाका और
मैमनसिंह शहर में प्रारम्भ किया गया। दस रुपये और सौ रुपये के नोट के ब्लाक
किसी प्रकार क्रान्तिकारियों ने बनवा लिए थे। श्री दिनेशचन्द्र लाहिड़ी, त्रैलोक्य-
नाथ चक्रवर्ती आदि यह कार्य करते थे । इसके बाद बंगाल के सोनारंग गाँव में
प्रबोधदास गुप्त और शचीन्द्र चक्रवर्ती यह कार्य करते रहे। इन दोनों को इस
अपराध में पांच-पांच वर्ष का कारावास दंड भी मिला। यह जाली नोट इतने त्रुटि-
पूर्ण बनते थे कि तुरन्त पकड़ाई में आ जाते थे। इसीलिए अन्ततः डकैती द्वारा
धन संचित करने के लिए विवश होना पड़ा। काकोरी में ट्रेन लूटने से धन तो
मिला, किन्तु सरकार तुरन्त समझ गई कि यह डकैती राजनीतिक उद्देश्य से डाली
गई है। पहले दो-एक संदेहास्पद व्यक्ति गिरफ्तार किये गए । वे दुर्भाग्य से इतने
कमजोर निकले कि जो कुछ मालूम था, सब पुलिस के सामने उगल दिया । फिर
तो देशभर में गिरफ्तारियां हुईं। श्री शचीन्द्र जो पर्चा बाँटने के जुर्म में सजा भुगत
रहे थे, वह भी इस केस में घसीट लिये गए। सरकार ने लगभग दस लाख रुपया
व्यय करके इस मुकदमे को साबित कर दिया। श्री शचीन्द्र फिर एक बार काला-
पानी जा पहुँचे ।
सन् 1937-38 में शचीन्द्रबाबू काकोरी के अन्य राजबन्दियों के साथ कांग्रेस
मंत्रिमंडल द्वारा रिहा किये गए । उन्होंने फिर पूर्वानुंसार इलाहाबाद के एक पत्र
में अपने क्रान्तिकारी कार्यों का विवरण लिखना प्रारम्भ किया। इसके अतिरिक्त
भी कुछ लेखादि लिखे जो पुस्तकाकार प्रकाशित हुए। इसके पश्चात् द्वितीय महा-
युद्ध प्रारम्भ हो गया, तो सरकार ने उनको नजरबन्द कर दिया। इन दिनों उनका
स्वास्थ्य बहुत जर्जर हो गया था। इसी अस्वस्थता के आधार पर नजरबन्दी से
उनकी मुक्ति हुई। घर पर रहकर शचीन्द्रबाबू चिकित्सा कराने लगे । इसी समय
श्री त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती उनसे बनारस जाकर मिले और श्री सुभाष बोस के
नेतृत्व में विद्रोह करने की योजना बताकर श्री शचीन्द्र से उसमें भाग लेने को
कहा। शचीन्द्र ने इसे स्वीकार कर लिया और परिवार की व्यवस्था करने के लिए
थोड़ा समय मांगा। वे यह व्यवस्था कर ही रहे थे कि क्षय रोग का आक्रमण उन
पर हो गया और सन् 1942 में भारत का यह महान् क्रान्तिकारी, अपनी आँखों
में स्वदेश की स्वाधीनता के सपने बसाए सदैव के लिए चिरनिद्रा में निमग्न हो
गया। अब उनके शौर्य पूर्ण जीवन की केवल स्मृति-भर शेष रह गई है।

RAJA RAMMOHUN ROY
LIBRARY FOUNDATION
उपहार स्वरूप
Gifted by
राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान द्वारा
RAJA RAMMOHUN ROY
LIBRARY FOUNDATION
BLOCK DD-34 SECTOR 1 SALT LAKE
CALCUTTA-700 064

शहीद ग्रंथ-माला
संपादक : बनारसीदास चतुर्वेदी
इस माला का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को उन अमर शहीदों की बलिदान-
गाथाओं से परिचित कराना है जिन्होंने हँसते-हँसते स्वाधीनता की बलिवेदी पर
अपने प्राणों की आहुति दे दी, जिनकी कीर्ति देश के भावी सपूतों को सदा प्रेरणा
देती रहेगी। इस माला की पुस्तकों की मुख्य विशेषता इनकी प्रामाणिकता है।
भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास : मन्मथनाथ गुप्त
ब्रिटिश सरकार ने छपते ही यह पुस्तक जब्त कर ली थी। जब्ती के पश्चात्
इसके तीन संस्करण और हुए तथा इस विषय पर यह सारे भारतीय साहित्य में
सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ माना गया। यह इसका नवीन संस्करण है।
यश की धरोहर : (भगवानदास माहोर, सदाशिवराव मलकापुर, शिव वर्मा)
भारतीय क्रान्ति के यज्ञ मे अपने प्राणों की बलि देने वाले युवकों सरदार
भगतसिंह, राजगुरु, चन्द्रशेखर आजाद, नारायणदास खरे तथा सुखदेव के चिर-
स्मरणीय मार्मिक संस्मरण।
आत्मकथा : रामप्रसाद बिस्मिल
जेल में फाँसी से दो दिन पूर्व लिखी गई यह आत्मकथा हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ
आत्मकथा है। यह आत्मकथा हाथ मे लेते ही हृदय मे एक सिहरन-सी होने लगती
है। भारत के सभी सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत पुस्तकालयों में इस आत्मकथा का
होना अत्यंत आवश्यक है।
गणेश शंकर विद्यार्थी : (देवव्रत शास्त्री, भूमिका : जवाहरलाल नेहरू)
अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी की सजीव बलिदान गाथा, जो हमें
स्वतंत्रता और न्याय के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने को प्रेरित करती है।
बन्दी जीवन : शचीन्द्रनाथ सान्याल
गदर पार्टी का इतिहास : (प्रीतमसिंह पंछी)
इसमें बड़ी खोज के साथ यह दिखाया गया है कि अमेरिका में भारतीयों ने
गदर पार्टी का संगठन कैसे किया । उनके त्याग और बलिदान की कथा बड़े
रोमांचकारी शब्दों में लिखी गई है। यह ग्रंथ भारतीय स्वाधीनता-संग्राम के
इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
आत्माराम एण्ड संस
कश्मीरीगेट, दिल्ली-110006