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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 256 में से

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पृष्ठ 194

१३४ औचित्यविचारचर्चा
उक्त पद्य में सद्यः समागत वसंत से कमनीय उपवन की सरसता के द्वारा
सूचित की जा रही कामवासना के वर्णनक्रम में ऋतुसंधि के अनुरूप "कुन्दवृक्ष
फूल झड़ जाने से शून्य हो रहे हैं, पलाश आदि के वृक्ष नवनवोदित कुसुम-
कलिका के भार से अवनत हो रहे हैं, कोयलें मन ही मन अपने स्वरों का
सन्धान कर रही हैं, सूर्य की किरणें शीत की अधिकता का तो विनाश कर रही
हैं, परन्तु कष्ट देनेवाली तीक्ष्णता को नहीं धारण कर रही हैं"। इस युक्ति में
सब जगह वर्तमान काल का जो प्रयोग किया गया है उससे हृदय की मधुर
भावना के अनुरूप एक अपूर्व ही औचित्य की सृष्टि हो रही है ।
यथा वा भट्टभल्लटस्य—
मृत्योरास्यमिवाततं धनुरिदं मूच्छद्विषास्तेषवः,
शिक्षा सा विजितार्जुना प्रतिलय सर्वाङ्गलग्ना गतिः ।
अन्तः क्रौर्यमहो शठस्य मधुनो हा हारि गीतं मुखे,
व्याधस्यास्य यथा भविष्यति तथा मन्ये वनं निर्मृगम्

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