आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलब्धवादः ३५७
भ्यासदर्शनात् । यदि च भेदग्रहेऽपि बुद्धित्वामात्रेण तदग्रहोऽ-
भेदारोप उपपद्यते,१ पार्थिवतया वृक्षात् काष्ठं, काष्ठादङ्गारस्ततो२
भस्माप्यभेदेन प्रतिसन्धीयेत, न चैवम् ।
स्यादेतत् , आलयभेदाग्रहात् प्रतिसन्धानमिति चेत्, न, स
ह्याहमास्पदं प्रवृत्तिसन्तानादन्य एव वा स्यात् ? तदन्तःपाति-
कादाचित्कानेकाहंप्रत्ययरूपो वा ? न तावदाद्यः, न ह्यहमहि-
मिकया मिथः स्वतन्त्रं सन्तानद्वयमनुभूयते । सत्यपि वा परस्पर-
मनुपादोपादेयभावान्न परस्परं प्रत्याकलितार्थानुसन्धानबन्धः ।
देखूँगा” इत्यादि स्थलोंमे विषयभेद तो नहीं भासित होता किन्तु
ज्ञानोंका भेद स्पष्ट ही भासित होता है ।
यदि कहो कि-उक्त बुद्धियोंमे भेदग्रह होनेपर भी बुद्धित्वेन
रूपेण भेद अगृहीत है, इसीलिये वहाँ असर्वज्ञोंको होता हुआ अभेद्-
प्रतिसन्धान आरोपित अर्थात् भ्रमात्मक है-तो यदि बुद्धित्व-सामान्यके
कारण बुद्धियोंमें अभेदारोप हो तो पार्थिवत्व-सामान्यके कारण वृक्षसे
काठ, काठसे अङ्गार तथा अङ्गारसे भस्म भी अभिन्नरूपमे भासित होना
चाहिये, किन्तु ऐसा नहीं होता है ।
अस्तु, विषयभेदसे प्रवृत्तिविज्ञानोंमें भेदग्रह भले ही हो किन्तु
“अहम्’ इत्याकारक निर्विषयक आलयविज्ञानोंमें भेदका अग्रह होनेसे
भ्रमात्मक अभेद-प्रतिसन्धान हो जायगा-तो ऐसा भी नहीं कह सकते ।
क्योंकि अहमास्पद वह आलयविज्ञानसन्तान प्रवृत्तिविज्ञानसे भिन्न ही
है ? या प्रवृत्तिविज्ञानसन्तानके अन्तर्गत ही कदाचित् होनेवाला अनेक
अहम्इत्याकारक-प्रत्यय ( प्रतीति ) रूप है ? इन दोनों पक्षोंमें आद्य पक्ष
नहीं हो सकता । क्योंकि स्पर्द्धाके साथ आपसमें स्वतन्त्र द्विविध विज्ञान-
सन्तानोंका अनुभव नहीं होता है । यदि स्वतन्त्ररूपसे दो विज्ञानसन्तान
( आलयविज्ञानसन्तान और प्रवृत्तिविज्ञानसन्तान ) हों भी तथापि उन
दोनोंमें परस्पर उपादानोपादेयभाव नहीं होनेसे एक दूसरेके द्वारा ज्ञात-
विषयका अनुसन्धान ( प्रतिसन्धान या स्मरण ) एक दूसरेको नहीं हो
१. उपयुज्यत इति १ पु० पा० २. तस्मादिति मणोरथसम्मत. पाठः ।