आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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प्रतिसन्धत्ते, न तु सत्यं तत्प्रतिसन्धानमतो न तावन्मात्रा-
देक१कर्त्तृत्वसिद्धिरिति चेत्, तत् किं सर्वज्ञस्यापि ? आहार्यो न
दोषावह इति चेत्, न, निबन्धनाभेदेऽपि कथमेक आहार्योऽन्यस्तु
स्वरसवाहीति वाच्यम् ।
भेददर्शनादर्शनाभ्यामिति चेन्न, प्रवृत्तिविज्ञानानां भेदस्या-
सर्वज्ञैरपि दर्शनात् । विषया एव भिन्नाः प्रतिभान्ति न बुद्धय
इति चेन्न, तासामपि भेदनिश्चयात्, विषयभेदाप्रथनेऽपि ज्ञाना-
यदि कहो कि—सर्वज्ञ अपने पूर्वापर ज्ञानोंमे एककर्त्तृत्वका प्रति
सन्धान तो अवश्य करता है, किन्तु यह प्रतिसन्धान वास्तविक नहीं है ।
अत केवल प्रतिसन्धानके आधारपर एक स्थिर कर्ताकी सिद्धि नहीं हो
सकती है—तो क्या सर्वज्ञको भी विपर्यय (मिथ्याज्ञान) होता है ?
यदि कहो कि—सर्वज्ञको अन्य लोगोंके समान स्वाभाविक भ्रमात्मक
ज्ञान नहीं होता है किन्तु आहार्य (इच्छापूर्वक) विपर्ययज्ञान होनेमे
कोई दोष नहीं है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि समान प्रयोजक
होनेपर भी क्यों किसी का प्रतिसन्धान आहार्य होगा और दूसरेका
स्वभावत भ्रमात्मक होगा ? यह तुम्हें बताना चाहिये ।
यदि कहो कि—असर्वज्ञ व्यक्ति बुद्धियोंका भेद नहीं जानता है,
इसलिये उसका प्रतिसन्धान भ्रमात्मक है तथा सर्वज्ञ व्यक्ति बुद्धियोंका
भेद समझता है, इसलिये उसका अभेद प्रतिसन्धान जानबूझकर होनेके
कारण आहार्य होता है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि नीलपीतादि
विषयक प्रवृत्तिविज्ञानोंका भेद तो असर्वज्ञ व्यक्ति भी जानते हैं ।
यदि कहें कि—असर्वज्ञोंको नीलपीतादि विषयोंमें ही भेदका भान
होता है, बुद्धियोंमें नहीं—तो ऐसी बात नहीं है । क्योंकि बुद्धियों
में भी भेदका निश्चय होता ही है । अन्यथा “अज्ञासिषम् जानामि
ज्ञास्यामि” इसप्रकार कोई बुद्धि अतीत, कोई वर्तमान, तथा कोई
अनागत नहीं प्रतीत होती । बल्कि धारावाहिक बुद्धि स्थलमे विषय
भेदकी प्रतीति नहीं होनेपर भी ज्ञानोंमें भेदकी प्रतीति होती है । ऐसे
ही “प्रभाद्वारा जिसका अनुमान किया था, उसीको देख रहा हूँ और
१ न्मात्रादनेकवत् इति १ पु० पा०