आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १५७
द्वितीये तु तद्गतधर्मविरहाद्व्यावृत्तस्तद्वानैव स्यात् ।
तत्र च न विवादः ।
मिथः सम्भिन्नाकाराः पिण्डा एव साधारणं रूपमस्तु,
कृतमतद्रूपपरावृत्त्येति चेत्, न, सम्भेदाभावात् । स हि न
वास्तवः, पिण्डानां विरुद्धधर्माध्यस्तत्वात् । नाभिमानिकः,
शावलेयादेर्भेदेनैव प्रथनात् । तद्धर्माणां सम्भेदाभिमान इति
चेन्, न, धर्म्यतिरिक्तधर्मानभ्युपगमात् । अभ्युपगमे वा
पर्यवसितं विवादेन ।
द्वितीयपक्षमे तो उस गोव्यक्तिमे वर्तमान गोत्वधर्मसे शून्य जो वस्तु,
उससे व्यावृत्त ( भिन्न ) जो होगा, वह गोत्वधर्मवान् ही होगा । और
उसमे कोई विवाद नही है । अर्थात् इस पक्षमे भी गोत्वजातिकी
सिद्धि होनेसे मेरा अभीष्ट ही सिद्ध हुआ ।
धर्मकीर्तिमतखण्डन
परस्परमे एकाकार पिण्ड ही साधारणरूप हैं । अर्थात् पिण्डोंकी
एकाकारता ही उनकी अनुगत बुद्धिका विषय है न कि पिण्डगत कोई
जाति । इसीलिये जातिखण्डनके लिये अतद्व्यावृत्तिका सहारा लेना
भी अनावश्यक है । धर्मकीर्तिका यह पिण्डैक्यवाद भी ठीक नहीं है,
क्योंकि पिण्डोंका एकत्व ही असम्भव है । कारण, पिण्डोंका वास्त-
विक एकत्व हो नहीं सकता, क्योंकि सभी पिण्ड परस्पर विरुद्ध धर्मों से
युक्त हैं । पिण्डोंका काल्पनिक एकत्व भी नहीं हो सकता है । क्योंकि
शावलेय आदि सभी पिण्ड भिन्न भिन्न रूपमे ही भासित होते हैं ।
यदि कहें कि—पिण्ड भले ही भिन्न-भिन्न रूपसे भासित होते हैं
किन्तु उनके धर्मोंमें एकत्वका अभिमान होता है और यही धर्मगत
आभिमानिक एकत्व अनुगत प्रतीतिका विषय है—तो यह कथन भी ठीक
नहीं है । क्योंकि आपके मतमें धर्मीसे अतिरिक्त धर्मकी सत्ता ही नहीं
है । यदि धर्मीसे अतिरिक्त धर्मकी सत्ता माने तो हमारे साथ विवाद
ही समाप्त हो जाता है । क्योंकि आपने भी वास्तविक अनुगत धर्म
( जाति ) की सत्ता स्वीकार ही कर ली ।