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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 530 में से

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पृष्ठ 205

३५६ आत्मतत्त्वविवेके

भवत्येव । यथा ह्येको गौरगोव्यावृत्तस्तथाऽपरेऽपि गाव इति
चेत्, अथ कोऽयमगौर्नाम ? किमेकस्य गोःस्वलक्षणस्यानात्मा ?
आहोस्वित् तद्गतधर्माविरही ?
प्रथमे न गवान्तरेऽपि गोशब्दविकल्पौ प्रवर्तेयाताम्,
अश्वादिवदनात्मत्वाविशेषात् । अतिप्रसङ्गश्च, महिषमातङ्गा-
द्यगोव्यावृत्त्याऽश्वेऽपि गोव्यवहारप्रसङ्गात् । स गोरपि व्या-
वर्तत इति चेत्, तत् किमभिमतो गौर्गौरपि न व्यावर्तते ?
व्यावर्तते, किन्तु स्वयमप्यसौ गौरिति चेत्, यद्यगोव्यावृत्ति-
रेवास्य गोत्व, तदश्वेऽपि समानम् । अन्यचेत्तदुच्यताम् ।
सभी गोव्यक्तियोंका समानधर्म है, जिसके द्वारा स्वलक्षणात्मक गोव्यक्ति
भी संकेतका विषय एव शब्दप्रयोगके योग्य हो सकता है ।
( उत्तरपक्ष ) यहा यह बताओ कि "अगौ" क्या वस्तु है ? क्या
एक गोव्यक्तिसे जो भिन्न है, उसे अगौ कहते हैं ? अथवा उस गोव्यक्ति
मे रहनेवाली गोत्वजातिसे जो शून्य है, उसे अगौ कहते हैं ?
यहां प्रथमपक्ष स्वीकार करनेपर अन्य गौमें भी गोशब्दका प्रयोग और
सविकल्पक ज्ञानकी प्रवृत्ति न हो सकेगी । क्योंकि अश्वादिके समान
अन्य गौ भी उस एक गौमे भिन्न है । साथ ही अतिप्रसङ्गदोष भी हो
जायगा । क्योंकि महिष (भैंसा) मातङ्ग (हाथी) आदि जो अगौ हैं उनकी
व्यावृत्ति होनेसे अश्वमे भी गोव्यवहार होने लगेगा । यदि कहो कि-
अश्व केवल महिषादि ( अगौ ) से ही व्यावृत्त नहीं होता बल्कि गौसे
भी व्यावृत्त होता है-तो क्या आपका अभीष्ट गौ गौसे भी व्यावृत्त
न होता ? यदि कहो कि-वह गौ अन्य गौसे व्यावृत्त तो होता है
किन्तु स्वयं भी वह गौ है-तो उसके स्वयं गौ होनेका कारण जो गोत्व
है, वह क्या चीज है ? यदि अगोव्यावृत्ति ही इसका गोत्व हो तो वह
पूर्वोक्तरीतिसे अश्वमें भी समान ही है । अर्थात् महिषादिरूप अगौसे
व्यावृत्त होनेके कारण अश्व भी गौ ही होवे । यदि गोत्व कोई और
वस्तु हो तो उसे कहो । अर्थात् गोत्व अन्यव्यावृत्ति-(अपोह) रूप न
होकर विधात्मक जातिरूप हो तो वस्तुभूत जातिकी सिद्धि ही हो गयी ।