आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतर्हि स्फुरिते स्वाकार एव प्रवर्तयतु, तत्र प्रवृत्त एव
चार्थी तत्सदृशमर्थमासादयति प्रभायां प्रवृत्तो मणिरदिति
चेत् , न, अभिमतार्थक्रियासामर्थ्यविरहिण्यप्रवृत्तेः । न बाह्ये
विकल्पाकारारोपसंभवः, तस्य तेनासंस्पर्शात् । न चाकारे
बाह्यत्वारोपः, स्वरूपे स्फुरत्यस्वरूपारोपानवकाशात् । प्रभायां
तु मणिबुद्ध्यैव मण्यर्थी प्रवर्तते, न तु तद्बुद्ध्येति दृष्टान्तो-
ऽप्याभासः ।
न चाकाराद्बहिःस्फुरतोऽर्थस्य सत्तायां प्रमाणमप्यस्ति ।
सौत्रान्तिकके आकारवादका खण्डन
यह कहना कि—ज्ञान और ज्ञेयमें आकारसाम्य भले ही मत होवे
तथापि सविकल्पक ज्ञान अपने आकारके रूपमे स्फुरित होने वाले बाह्य
नीलत्वादिमे ही प्रवृत्ति कराता है और उसमे प्रवृत्त हुआ अर्थी व्यक्ति
उसके सदृश स्वलक्षणात्मक वस्तुको वैसे ही प्राप्त कर लेता है, जैसे प्रभा
मे प्रवृत्त व्यक्ति मणिको प्राप्त कर लेता है—ठीक नहीं है। क्योंकि
अभिमत दाहादि अर्थक्रियाके प्रति सामर्थ्य नहीं होनेसे ज्ञानाकारमे भी
प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। कारण, लोकमे वह्निरूप बाह्य अर्थ ही
दाहादिसमर्थरूपमे विदित है, न कि आन्तर वह्निज्ञान ।
यदि कहो कि—ज्ञानाकार और अर्थक्रियासमर्थ बाह्यवस्तुमे अभेदा-
रोप होनेसे प्रवृत्ति होती है—तो यह भी ठीक नहीं है। क्योंकि बाह्य
वस्तुमे ज्ञानाकारका आरोप असम्भव है। कारण, आपके मतमे बाह्य
वस्तुका ज्ञानके साथ स्पर्श तक नहीं है। इसी प्रकार ज्ञानाकारमे बाह्यत्व
का भी आरोप नहीं हो सकता । क्योंकि स्वप्रकाश होनेके कारण ज्ञान-
स्वरूपके भासित होनेसे उसमे उसके अस्वरूपभूत बाह्यका आरोप
असंभव है, जैसे रज्जुस्वरूपके भासित हो जानेपर उसमे सर्पत्वका
आरोप नहीं होता। और जो प्रभामणिका दृष्टान्त दिया है, वह भी
दृष्टान्ताभासमात्र है। क्योंकि मण्यर्थी व्यक्ति मणिबुद्धिसे ही प्रभामे
प्रवृत्त होता है और मणि पा लेता है, प्रभाबुद्धिसे नहीं।
एवं आकारवादी सौत्रान्तिकके मतमे ज्ञानमें नहीं भासित होनेवाले