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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 530 में से

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पृष्ठ 201

१५२ आत्मतत्त्वविवेके

ग्रीसाम्यम्, बाह्ये धूमाद्यनुविधीयमानस्य कारणस्य दृश्य-
त्वात् धूमज्ञानस्य च तद्व्यभिचारोपलम्भात् । न च तदेव
कारणमेकत्र दृश्यमदृश्यं चान्यत्रेति युक्तम् ।
यदि च नीलिमादिर्विज्ञानस्य जातिविशेषः, कथं तदति-
पत्य ज्ञेयं स्पृशेत् ? ज्ञेयस्य चेत्, कथं ज्ञानं तद्विशिष्यादिति
जातिसङ्करापादनप्रस्तावे चिन्तितप्रायम् । तस्मात् स्फुरित
एव ज्ञान प्रवर्त्तयतीति गले पादुकयाऽप्यङ्गीकारयितव्यो
गत्यन्तराभावात् ।
क्योंकि बाह्यस्थलमे धूमादिकी उत्पत्ति के लिये अपेक्षित अग्नि आदि
कारण दृश्य होते हैं, तथा धूमज्ञानकी उत्पत्तिके लिये अग्नि आदि दृश्य
कारणका व्यभिचार देखा जाता है । अर्थात् दृश्य वह्निके बिना भी
धूमज्ञान हो जाता है ।
एवं यह भी कहना ठीक नहीं होगा कि वही अग्निरूप कारण
धूमकी उत्पत्तिमें दृश्य होकर तथा धूमज्ञानकी उत्पत्तिमें अदृश्य होकर
कारण होगा ।
यदि कहो कि-नीलत्वादि जो ज्ञानके आकार हैं, वे ही स्वलक्षणात्मक
ज्ञेयके भी आकार है, इसलिये आकारसाम्यके कारण ही विकल्प स्वलक्षण
में ही प्रवृत्ति कराता है, अन्यत्र नहीं- तो वह नीलत्वादि आकार यदि
विज्ञानगत कोई जातिविशेष हो तो वह विज्ञानको छोड़कर ज्ञेयमे कैसे
रह सकता है ? यदि वह ज्ञेयवस्तुगत कोई जाति हो तो वह ज्ञानको कैसे
विशेषित कर सकता है ? यह बात जातिसाङ्कर्यापादनप्रकरणमे प्राय
विचारी जा चुकी है । इसलिये "स्फुरित विषयमे ही ज्ञान प्रवृत्ति
कराता है" यह बात "गले पादुका" न्यायसे भी स्वीकार करनी होगी ।
क्योंकि इसमे दूसरी गति नहीं है ।