अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैश्वानरो नो अधिपा वसिष्ठ उदिन्नयाति सुकृतस्य लोकम्.. (१)
हे अग्नि देव! व्यवहार करने में अशक्त हो कर मैं ने जो ऋण लिया और उसे नहीं चुका
पाया; मैं उसे देने की प्रतिज्ञा करता हूं. सभी प्राणियों के हितैषी, पालन कर्ता एवं वश में करने
वाले अग्नि हमें पुण्य कर्मों के फल के रूप में मिलने वाला लोक प्रदान करें. (१)
वैश्वानराय प्रति वेदयामि यदृणं संगरो देवतासु.
स एतान् पाशान् विचृतं वेद सर्वानथ पक्वेन सह सं भवेम.. (२)
मुझ पर जो लौकिक ऋण एवं देवों के प्रति की गई प्रतिज्ञा पूर्ण न करने का ऋण है,
उन सब को मैं अग्नि देव को बताता हूं. अग्नि देव इन लौकिक और दैविक ऋण रूपी पाशों
को ढीला करना जानते हैं. (२)
वैश्वानरः पविता मा पुनातु यत् संगरमभिधावाम्याशाम्.
अनाजानन् मनसा याचमानो यत् तत्रैनो अप तत् सुवामि.. (३)
सभी भावों को पवित्र करने वाले अग्नि मुझे पवित्र करें. मैं ने ऋण चुकाने एवं यज्ञ
करने का जो वचन दिया है तथा मैं देवों में जो आशा उत्पन्न करता हूं, उन के ऋण को
चुकाता नहीं हूं. मैं अपने मन से लौकिक सुखों की याचना करता हूं. इस प्रकार के असत्य
भाषण में जो पाप है, उसे मैं दूर करता हूं. (३)
सूक्त-१२० देवता—अंतरिक्ष आदि
यदन्तरिक्षं पृथिवीमुत द्यां यन्मातरं पितरं वा जिहिंसिम.
अयं तस्माद् गार्हपत्यो नो अग्निरुदिन्नयाति सुकृतस्य लोकम्.. (१)
मैं ने अंतरिक्ष में रहने वाले, पृथ्वी पर रहने वाले तथा स्वर्गलोक में रहने वाले जनों की
हिंसा के रूप में जो पाप किया है, मैं ने अपने मातापिता के प्रतिकूल आचरण कर के जो
हिंसा रूपी पाप किया है, गृहस्थों द्वारा सेवित यह अग्नि मुझे उन पापों से छुड़ा कर उन
लोकों को प्राप्त कराएं जो पुण्य कर्म करने वालों को प्राप्त होते हैं. (१)
भूमिर्मातादितिर्नो जनित्रं भ्राता ऽ न्तरिक्षमभिशस्त्या नः.
द्यौर्नः पिता पित्र्याच्छं भवाति जामिमृत्वा माव पत्सि लोकात्.. (२)
पृथ्वी हमारी माता है और देवमाता अदिति हमारे जन्म का कारण है. अंतरिक्ष हमारा
भाई है. यह मुझे मिथ्या भाषण रूपी पाप से बचाए. आकाश हमारा पिता है. वह पिता से
आए दोष से हमें बचाए एवं हमें सुखी बनाए. मैं व्यर्थ ही प्राण त्याग कर के तथा यज्ञ आदि न
कर के स्वर्गलोक से अधोगति प्राप्त न करूं. (२)
यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोगं तन्व १: स्वायाः.