अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 343, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपमित्य धान्यं १ यज्जघसाहमिदं तदग्ने अनृणो भवामि.. (२)
हम इस लोक में रहते हुए ही धनी को ऋण लौटाते हैं. इस लोक में जीवित रहते हुए ही
जीवित धनी को ऋण चुकाना चाहिए. मैं ने धनी से ले कर जो अन्न खाया है, हे अग्नि!
तुम्हारी कृपा से मैं दूसरे का धान्य खाने के ऋण से छूट जाऊं. (२)
अनृणा अस्मिन्ननृणाः परस्मिन् तृतीये लोके अनृणाः स्याम.
ये देवयानाः पितृयाणाश्च लोकाः सर्वान् पथो अनृणा आ क्षियेम.. (३)
हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इस लोक में, स्वर्ग आदि परलोकों में तथा स्वर्ग से उत्तम
लोक में ऋण रहित हो कर जाऊं. जो देवों के गमन के लोक हैं, पितरों के गमन से लोक हैं, मैं
वहां ऋण रहित हो कर ही जाऊं. (३)
सूक्त-११८ देवता—अग्नि
यद्धस्ताभ्यां चकृम किल्बिषाण्यक्षाणां गत्नुमुपलिप्समानाः.
उग्रंपश्ये उग्रजितौ तदद्याप्सरसावनु दत्तामृणं नः.. (१)
इंद्रियों के विषयों—शब्द, स्पर्श, रूप आदि को प्राप्त करने के लिए हम ने जो पाप किए
हैं, हे उग्रंपश्या एवं उग्रजिता नाम की अप्सराओ! आज हमारा ऋण अनुकूल रूप से धनी को
चुकाओ, जिस से हम उऋण हो सकें. (१)
उग्रंपश्ये राष्ट्रभृत् किल्बिषाणि यदक्षवृत्तमनु दत्तं न एतत्.
ऋणान्नौ नर्णमेर्त्समानो यमस्य लोके अधिरज्जुरायत्.. (२)
हे उग्रंपश्या और राष्ट्रभीति नामक अप्सराओ! हम ने जो पाप किए हैं जैसे इंद्रियों का
निषिद्ध विषयों में जाना; हमारे ऊपर ऋण के रूप में चढ़ा हुआ जो पाप है, उसे हमारे
अनुकूल हो कर समाप्त कर दो. इस से हमारे ऋणी होने के कारण यमराज इस लोक में पाश
ले कर हमें पकड़ने न आ सकें. (२)
यस्मा ऋणं यस्य जायामुपैमि यं याचमानो अभ्यैमि देवाः.
ते वाचं वादिषुर्मोत्तरां मद्देवपत्नी अप्सरसावधीतम्.. (३)
मैं जिस धनी का ऋण धारण करता हूं, मैं कामुक बन कर जिस की पत्नी के पास
जाता हूं अथवा जिस पुरुष के पास मैं ऋण के रूप में धन मांगने के लिए जाता हूं, हे देव! वे
सब मुझ से प्रतिकूल बातें न कहें. हे अप्सराओ! मेरी यह बात अपने मन में धारण करो. (३)
सूक्त-११९ देवता—वैश्वानर अग्नि
यददीव्यन्नृणमहं कृणोम्यदास्यन्नग्न उत संगृणामि.