अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1001, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त-८५ देवता—इंद्र
मा चिदन्यद् वि शंसत सखायो मा रिषण्यत.
इन्द्रमित् स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत.. (१)
हे स्तोताओ! तुम अन्य किसी देवता का आश्रय मत लो. तुम किसी अन्य देवता की
स्तुति मत करो. हे तैयार किए गए सोमरस वाले होताओ! तुम इंद्र की स्तुति करते हुए
बारबार उक्थों का गान करो. (१)
अवक्रक्षिणं वृषभं यथा ऽ जुरं गा न चर्षणीसहम्.
विद्वेषणं संवननोभयंकरं मंंहिष्ठमुभयाविनम्.. (२)
इंद्र सांड़ के समान घूमने वाले, संघर्षशील, अवकक्षी, शत्रुओं के द्वेषी, अजर, अतिशय
महिमाशाली, सेवा के योग्य तथा दोनों लोकों के रक्षक हैं. (२)
यच्चिद्धि त्वा जना इमे नाना हवन्त ऊतये.
अस्माकं ब्रह्मेदमिन्द्र भूतु ते ऽ हा विश्वा च वर्धनम्.. (३)
हे इंद्र! तुम्हारा संरक्षण पाने के लिए बहुत से पुरुष तुम्हें बुलाते हैं. हमारा यह स्तोत्र भी
तुम्हारी वृद्धि करने वाला है. (३)
वि तर्तूर्यन्ते मघवन् विपश्चितो ऽ र्यो विपो जनानाम्.
उप क्रमस्व पुरुरूपमा भर वाजं नेदिष्ठमूतये.. (४)
हे इंद्र! तुम यहां शीघ्र आ कर विशाल रूप धारण करो. इन विद्वान् मनुष्यों और
यजमानों की उंगलियां शीघ्रताकारी हैं. तुम हमारे पालन के लिए अन्न हमारे समीप लाओ
तथा हमें प्रदान करो. (४)
सूक्त-८६ देवता—इंद्र
ब्रह्मणा ते ब्रह्मयुजा युनज्मि हरी सखाया सधमाद आशू.
स्थिरं रथं सुखमिन्द्राधितिष्ठन् प्रजानन् विद्वां उप याहि सोमम्.. (१)
हे इंद्र! मैं कर्मवान मंत्रों के द्वारा तुम्हारे रथ में अश्वों को जोड़ता हूं. हे विद्वान् इंद्र! इस
सुखदायक रथ पर चढ़ कर तुम हमारे इस सोमरस के पास आओ. (१)
सूक्त-८७ देवता—इंद्र, बृहस्पति
अध्वर्यवो ऽ रुणं दुग्धमंशुं जुहोतन वृषभाय क्षितीनाम्.
गौराद् वेदीयां अवपानमिन्द्रो विश्वाहेद्याति सुतसोममिच्छन्.. (१)
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