अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1000, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्तोतारमिद् दिधिषेय रदावसो न पापत्वाय रासीय.. (१)
हे इंद्र! मैं तुम्हारे समान प्रभुत्व प्राप्त करूं तथा स्तुति करने वालों को धन देने वाला
बनूं, पाप कर्म करने वाले धनी मुझे व्यथित न करें. (१)
शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे राय आ कुहचिद्विदे.
नहि त्वदन्यन्मघवन् न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन.. (२)
हे इंद्र! मैं जहां से चाहूं, वहीं से धन प्राप्त कर सकूं. जो मुझ से उत्कृष्ट होना चाहे, उसे
मैं स्वर्ण का दंड दूं. हे इंद्र! मुझे इस प्रकार की शक्ति देने वाला तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन
रक्षक हो सकता है? (२)
सूक्त-८३ देवता—इंद्र
इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत्.
छर्दैर्यच्छ मघवद्भ्यश्च मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः.. (१)
हे इंद्र! मुझे मंगलकारी घर दो तथा हिंसा करने वाली शक्तियों को यहां से दूर भगाओ.
(१)
ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभिप्रघ्नन्ति धृष्णुया.
अध स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव.. (२)
हे इंद्र! तुम्हारे जो बल शत्रुओं को संतप्त करते और मारते हैं, तुम अपने उन्हीं बलों से
हमारे शरीरों की रक्षा करो. (२)
सूक्त-८४ देवता—इंद्र
इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः. अण्वीभिस्तना पूतासः.. (१)
हे इंद्र! यहां आओ. यह तैयार किया गया सोमरस तुम्हारे लिए ही है. (१)
इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः. उप ब्रह्माणि वाघतः.. (२)
हे इंद्र! ये विद्वान् ब्राह्मण तुम्हें अपने से श्रेष्ठ स्वीकार करते हैं. इन मंत्रों से संपन्न ब्राह्मणों
और सोमरस वाले ऋत्विजों के समीप आओ. (२)
इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः. सुते दधिष्व नश्चनः.. (३)
हे इंद्र! तुम अश्वों के स्वामी हो, इसलिए हमारे स्तोत्रों को सुनने के लिए हमारे समीप
शीघ्र आओ तथा हमारे तैयार सोमरस के पास अपने अश्वों को रोको. (३)
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