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सर्वकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 405 में से

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पृष्ठ 340

अठारहवाँ प्रकरण । ३३३

उन करके सत्कार किया हुआ न हर्ष को प्राप्त होता है। क्योंकि
राग-द्वेष का हेतु जो मोह है, सो मोह उनमें नहीं है ॥ ५५ ॥

मूलम् ।
संतुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते ।
तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते ॥ ५६ ॥

पदच्छेदः ।
सन्तुष्टः, अपि, न, संतुष्टः, खिन्नः, अपि, न, च, खिद्यते,
तस्य, आश्चर्यदशाम्, ताम्, ताम्, तादृशाः, एव, जानते ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
+ ज्ञानी=ज्ञानी पुरुषअपि=भी
+ लोकदृष्ट्या=लोक-दृष्टि सेन खिद्यते= { नहीं दुःख को प्राप्त होता है
संतुष्टः=सन्तोषवान् हुआतस्य=उसकी
अपि=भीताम् ताम्=उस उस
न=नहींआश्चर्यदशाम्=आश्चर्य दशा को
संतुष्टः=संतुष्ट हैतादृशा एव=वैसे ही ज्ञानी
च=औरजानते=जानते हैं ॥
खिन्नः=खेद को पाया हुआ

भावार्थ ।
हे शिष्य ! लोक-दृष्टि करके खेद को प्राप्त हुआ भी वह
खेद को नहीं प्राप्त होता है और लोक-दृष्टि करके हर्ष को
प्राप्त हुआ वह हर्ष को नहीं प्राप्त होता है । ऐसे विद्वान् की
आश्चर्यवत् लीला को विद्वान् ही जानता है, दूसरा नहीं ॥ ५६ ॥