अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३१० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
जगत् में कर्मादिकों के अभ्यासपरायण जो अज्ञानी पुरुष
हैं, वे उस आत्मा को नहीं जानते हैं, जो शुद्ध है अर्थात् जो
मायामल से रहित है, जो स्वप्रकाश है, जो परिपूर्ण है, जो
प्रपञ्च से रहित है और जो दुःख के सम्बन्ध से भी रहित है ॥३५॥
मूलम् ।
नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा ।
धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ ३६ ॥
पदच्छेदः ।
न, आप्नोति, कर्मणा, मोक्षम्, विमूढः, अभ्यासरूपिणा,
धन्यः, विज्ञानमात्रेण, मुक्तः, तिष्ठति, अविक्रियः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| विमूढः | =अज्ञानी | धन्यः | =भाग्यवान् |
| अभ्यासरूपिणा | =अभ्यासरूपी | पुरुषः | =पुरुष |
| कर्मणा | =कर्म से | विज्ञानमात्रेण | =केवल ज्ञान करके ही |
| मोक्षम् | =मोक्ष को | मुक्तः | =मुक्त हुआ |
| न आप्नोति | =नहीं प्राप्त होता है | तिष्ठति | = स्थित रहता है ॥ अर्थात् मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ |
| अविक्रियः | =क्रिया-रहित' |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो मूढ़ अज्ञानी
जन है, वह कर्मों करके अर्थात् योगाभ्यास-रूप कर्मों करके
भी मोक्ष को कदापि नहीं प्राप्त होते हैं ।