सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 287

२८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

विचार की और आचार्य के उपदेश की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर—अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञान-
रूपी मोह का आवरण सबके अन्तःकरण में हो रहा है ।
उस आवरण करके आत्मा का साक्षात्कार किसी को नहीं
होता है । उस आवरण के दूर करने के लिये गुरु और
शास्त्र की आवश्यकता है ।
जैसे दश पुरुषों ने एक नदी के पार उतर करके कहा
कि सबको गिनती कर लो, कोई नदी में बह तो नहीं गया
है । उनमें से एक पुरुष जब गिनती करने लगा, तब उसने
अपने को छोड़कर औरों को गिना, तब नव आदमी गिनती
में आए । उसने कहा, दशवाँ पुरुष नदी में बह गया है ।
फिर दूसरे ने गिना, तब उसने भी अपने को छोड़ करके ही
गिना, तब भी नव ही पुरुष पाए गए । इसी तरह हरएक ने
अपने को छोड़ करके गिना और एक कम पाया । तब उन
सबको निश्चय होगया कि दशवाँ पुरुष नदी में बह गया, तां
फिर वे सब मिलकर रोने लगे । उधर से एक बुद्धिमान्
पुरुष आया, जसने उनको रोते देखकर पूछा, तुम क्यों रोते
हो ? उन्होंने कहा, हम दश आदमी नदी से पार उतरे,
उनमें से एक आदमी नदी में बह गया है । उनकी वार्ता को
सुनकर उस आदमी ने जब उनको गिना, तब वे दश पूरे
थे । उसने जाना ये सब मूर्ख हैं । तब उनसे कहा, हमारे
सामने तुम फिर गिनो । उसके सामने जब एक उनमें से
गिनने लगा, तब उसने अपने को न गिना, और कहा केवल
नव हैं । तब उसने कहा, दशवाँ तू है । तब उसको ज्ञान
हुआ कि हम सब पूरे हैं, कोई भी बहा नहीं ।