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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 405 में से

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पृष्ठ 243

२३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अर्थात् अधिष्ठान असंग साक्षी हो करके तुम्हीं स्थित थे,
और रहोगे । क्योंकि तुम्हारे में ही यह संसार रज्जुसर्पवत्
कल्पित है । अब न तेरे में बन्ध है, और न मोक्ष है । तू
कृतकृत्य है ॥ १८ ॥

मूलम् ।
मा संकल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय ।
उपशाम्यसुखंतिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे ॥ १९ ॥

पदच्छेदः ।
मा, संकल्पविकल्पाभ्याम्, चित्तम्, क्षोभय, चिन्मय,
उपशाम्य, सुखम्, तिष्ठ, स्वात्मनि, आनन्दविग्रहे ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
चिन्मय=हे चैतन्यस्वरूप !उपशाम्य=मन को शान्त करके
$\begin{matrix}\textbf{संकल्प-} \ \textbf{विकल्पा-}= \ \textbf{भ्याम्}\end{matrix}\Biggr}$ संकल्प-विकल्पों से$\begin{matrix}\textbf{आनन्द-} \ \textbf{विग्रहे}\end{matrix}=आनन्द- पूरित
चित्तम=चित्त कोस्वात्मनि=अपने स्वरूप में
+ त्वम्=तूसुखम्=सुख-पूर्वक
मा क्षोभय=मत क्षोभित करतिष्ठ=स्थित हो ॥

भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे चैतन्यस्वरूप ! संकल्प
और विकल्पों करके अपने चित्त को क्षुब्ध न करो, किन्तु
संकल्प और विकल्प से तुम रहित होकर अपने आनन्दस्वरूप
में स्थित हो ॥ १९ ॥