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सर्वकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 405 में से

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पृष्ठ 186

ग्यारहवाँ प्रकरण । १७९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
$आब्रह्मस्तम्ब-\atopपर्यन्तम्=ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यंतच = और
शान्तः = शान्त-रूप
अहम् एव = मै ही हूँच = और
इति = इस प्रकार$प्राप्ताप्राप्त-\atopविनिवृत्तः=लाभालाभ-रहित पुरुष
निश्चयी = निश्चय करनेवाला
निर्विकल्पः = संकल्प-रहित+सुखीभवति = सुखी होता है ॥
शुचि = शुद्ध

भावार्थ ।

जीवन्मुक्तों के और लक्षणों को दिखलाते हैं—

ब्रह्मा से लेकर स्तंभर्यंत संपूर्ण जगत् मेरा ही रूप है, अर्थात् मैं ही सर्व-रूप हूँ, ऐसा निश्चय करनेवाला जो पुरुष है, वही निर्विकल्प समाधिवाला जीवन्मुक्त है, वही विषय-रूपी मल के सम्बन्ध से भी रहित है, वही शान्त चित्तवाला है, और वही प्राप्ताप्राप्त विषयों में इच्छा से रहित है, वही परम संतोषवाला है, वही अपने आत्मानंद करके ही पूर्ण है ॥ ७ ॥

मूलम् ।

नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी ।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

नानाश्चर्यम्, इदम्, विश्वम्, न, किञ्चित्, इति, निश्चयी निर्वासनः, स्फूर्तिमात्रः, न, किञ्चित्, इव, शाम्यति ॥