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सर्वकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

पञ्चमोऽध्यायः

अथातो द्रवद्रव्यविज्ञानौयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब हम इस अध्याय में द्रव ( जलीय ) द्रव्यों का व्याख्यान करेंगे। इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था।

निरुक्ति— ‘द्रवः’ शब्द की निष्पत्ति ‘द्रू गतौ’ भ्वादिगणीय धातु से ‘करोरप्’ ( अ० ३।३।५७ ) सूत्र से अप्र प्रत्यय जोड़कर हुई है। ‘द्रवणम्’ शब्द की निष्पत्ति उक्त धातु से ‘प्रद्वस्तुसुवः’ सूत्र से ‘घञ्’ प्रत्यय जोड़कर हुई है। इसके प्रद्रवणम्, उद्रवणम्, सद्रवणम्, विद्रवणम् रूप उपसर्ग विशेष के कारण बनते हैं। ‘द्रवः’ प्रदावनर्मणोः। विद्वरे रसगत्योश्च’ इति हैमः। ये सभी प्रयोग प्रसंगोचित हैं। ‘द्रव’ शब्द अनेक अर्थों का वाचक है। जैसे—घोड़े की भाँति दौड़ना, चूना, रिसना, गीला, टपकना आदि।

आधुनिक दृष्टिकोण— आज के विज्ञानविद् जल को तत्त्व न मानकर उसे दो तत्त्वों का मिश्रण मानते हैं। जैसे—‘ऑक्सीजन’ नामक गैस जो एक निश्चित अनुपात में ‘हाइड्रोजन’ से मिलकर पानी बनाती है या पानी के रूप में परिणत हो जाती है। हिन्दी में ‘ऑक्सीजन’ को ‘ओषजन’ और ‘हाइड्रोजन’ को ‘उदजन’ कहते हैं।

इसके विपरीत प्राचीन भारतीय विद्वान् जलतत्त्व के समान सभी पदार्थों को पाश्चभौतिक मानते हैं और उनका सिद्धान्त है कि अग्नितत्त्व से जलतत्त्व की उत्पत्ति हुई है। इतना ही नहीं, वे जल को ‘आप्’ कहते हैं, जिसका अर्थ होता है—सर्वत्र व्याप्त। और भी देखें—भारतीय त्रिकालदर्शी विद्वान् समुद्र में वडवानल नामक अग्नि की सत्ता को स्वीकार करते हैं, जो अग्नि समुद्र को नियमित किये रहती है। देखें—‘समुद्रे बाडवो ज्ञेयः’। उनकी उक्त कल्पनाएँ निराधार नहीं होती थीं। वे देखा करते थे कि जल तथा बर्फ से भी सदा भाप ( वाष्प ) निकलती रहती है, जो यह प्रमाणित करती है कि उस जल या बर्फ में अग्नि की सत्ता विद्यमान है। आज का वैज्ञानिक उसे ‘ओषजन’ तो कह लेता है, पर अग्नितत्त्व नहीं कहता; कहे भी कैसे, उसे भारतीयता से मानसिक द्वेष है।

एक और उदाहरण—आज का वैज्ञानिक अमीबा की खोज को अपनी सम्पत्ति समझता है, किन्तु यह सत्य नहीं है। इसके लिए आप वाजसेनेयि माध्यन्दिनशुक्लयजुर्वेदसंहिता प्रथम अध्याय के प्रथम मन्त्र को देखें—‘इषे त्वोर्जे त्वा’ ‘‘‘पशुर्माहि’। इसमें उस जल की इच्छा की गयी है, जो ‘अनमीबा’ अर्थात् अमीबा नामक कीटाणु से रहित हो या कर दिया गया हो।

जल की अनिवार्यता— पीने योग्य जल प्राणिमात्र का प्राण है, अतएव जल का एक पर्याय ‘जीवन’ भी है। इस समस्त संसार को इसीलिए भगवान् ने जलमय बनाया है। जिस परिस्थिति में जल पीने का अत्यन्त निषेध भी किया गया हो वहाँ पूर्णरूप से जल रोका नहीं जाता। जल को न देने से अथवा इसका सेवन न करने से मुब सूखने लगता है, शरीर ढीला पड़ जाता है अथवा मृत्यु भी हो सकती है। अतएव स्वस्थ अथवा रोगी प्राणी का जीवन-निर्वाह जल के बिना नहीं हो सकता है। ये वृद्धवाग्भट के उद्गार हैं। देखें—अ.सं.सू. ६।३०-३१।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. २७।१९६-२१६; सु.सू. ४५।३-४६; अ.सं.सू. ६।३-५१ में देखें।