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सर्वकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

स्पर्श में चिकनी, सिकुड़न (सलवट) रहित हों, तभी ये ब्रण को बाँधने के उपयोग में लायी जा सकती हैं ॥ २९ ॥

कूर्वीतानन्तरं तस्य रक्षां रक्षोनिषिद्धये । बलिं चोपहरेतेभ्यः—

ब्रणरक्षा-विधान—ब्रण के ऊपर उचित प्रकार की पट्टी बाँधने के बाद राक्षसों आदि की निवृत्ति के लिए रक्षाकर्म तथा बलिदान भी करें। क्योंकि राक्षस मांसभक्षी होते हैं, वे इस प्रकार अक्रमण न करें, अतएव रक्षा एवं बलि का यहाँ निर्देश किया गया है।

वक्तव्य—रक्षाविधान की विधि देखें—सू. ५।२०-३३ तक। रक्षाकर्म के लिए धूपन आदि भी किया जाता है, इसके बाह्य क्रिमियों का प्रकोप भी नहीं होता। आर्षग्रन्थों में जहाँ राक्षस आदि के निवारण की चर्चा है, उसे आधुनिक विद्वान् क्रिमि (Germ) कहते हैं। राक्षसों तथा क्रिमियों का कार्य आदि समान है। इसी से Sterilization अथवा Aseptic को आधुनिक विद्वान् रक्षाकर्म कहते हैं।

—सदा मूर्ध्नां च धारयेत् ॥ ३० ॥

लक्ष्मीं गृहामतिगृहं जटिलां ब्रह्मचारिणीम् । वचां छत्रामतिच्छत्रां दूर्वां सिद्धार्थकानपि ॥ ३१ ॥

औषधधारण-निर्देश—निम्नलिखित औषधद्रव्यों को शिरोधार्य करें—लक्ष्मी (पद्मचारिणी), गृहा (पुष्पिपर्णी), अतिगृहा (शालपर्णी), जटिला (मांसी), ब्रह्मचारिणी (ब्रह्मयष्टिका), वचा (बालवच), छत्रा (शतपुष्पा), अतिच्छत्रा (विषाणिका), दूब तथा सरसों ॥ ३०-३१ ॥

ततः स्नेहदिनेहोत्कं तस्याचारं समादिशेत् ।

आचार-निर्देश—तदनन्तर उस ब्रणरोगी को स्नेहविधि नामक अध्याय में निर्दिष्ट आहार-विहार का निर्देश करें और रोगी को उनका आचरण करना चाहिए।

वक्तव्य—अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान का स्नेहविधि नामक १६वाँ अध्याय है। देखें—श्लोक २६-२८।

दिवार्वन्धो ब्रणे कण्डुरागकशोफप्यकृत ॥ ३२ ॥

दिन में सोने का निषेध—दिन में सोने से ब्रण (घाव) में खुजली, लालिमा, पीड़ा, सूजन तथा पूय हो जाता है ॥ ३२ ॥

स्त्रोणां तु स्मृतिंसंस्पर्शदर्शनेश्चलितघृते । शुके व्यायोजान् दोषानसंसर्गेऽप्यवान्पुयात् ॥ ३३ ॥

(ब्रणे भयचुरायासात् स च रागश्च जागरात् । तौ च हक् च दिवास्वापाताश्च मृत्युश्च मैथुनात् । ११ )

अन्य निषिद्ध कर्म—सहवास करने योग्य स्त्रियों का स्मरण, स्पर्श (आलिंगन, चुम्बन आदि), दर्शन आदि से शुक्र का स्खलन तथा घाव होने पर मैथुन क्रिया न करने पर भी मैथुनकर्म करने के बराबर दोषों की प्राप्ति हो जाती है ॥ ३३ ॥ (परिश्रम करने से ब्रणस्थान में सूजन हो जाती है, रात्रि में जागने से शोथ तथा लालिमा, दिन में सोने से शोथ, लालिमा तथा पीड़ा होने लगती है और स्त्री-सहवास (मैथुन) करने से शोथ, राग, वेदना तथा मृत्यु हो जाती है ॥ ११ )

वक्तव्य—उक्त ३३वें तथा ३३वें श्लोकों का समर्थन सू. १९।१० एवं १५ वें श्लोकों में देखें। उक्त कोष्ठगत पद्य वाग्भट के अन्य संस्करणों में प्रायः नहीं देखा जाता है। वास्तव में यह पद्य अविकल रूप से सू. १९।३६ में हैं, देखें।

भोजनं च यथासात्तयं यवगोधूमपष्टिकाः । मसूरमुद्गुतुरीजीवन्तीसुनिषण्णकाः ॥ ३४ ॥

बालमूलकवार्ताकतण्डुलौयकवास्तुकम् । कारवेत्तलककर्कटपटोलकटुकफालम् ॥ ३५ ॥

सैन्धवं दाडिमं घात्री घृतं तसहिमं जलम् । जीर्णशाल्योदनं स्निग्धमल्पमुष्णोदकोत्तरम् ॥ ३६ ॥

भुज्जानो जाङ्ग्लैर्मसैः शीघ्रं ब्रणसपोहित ।