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सर्वकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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सिराब्यधविधिरध्यायः २७ ]

सूत्रस्थानम्

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वक्तव्य—सुश्रुत में उक्त विषय को इस प्रकार कहा गया है—'रक्तधातु के क्षीण हो जाने पर, रक्त का प्राप्त हो जाने पर पाचकाग्नि मन्द पड़ जाता है और वातदोष प्रकुपित हो जाता है। इसलिए न अधिक गरम, न अधिक शीतल, हल्के, स्निग्ध, रक्तवर्धक, खट्टे तथा मीठे भोजन उसे खिलायें'। चरक सू. २४ में उक्त ५१ तथा ५२ श्लोक अविकलरूप से क्रम संख्या २३ तथा २४ में दिये हैं।

प्रसन्नवर्णोन्दिप्रमिन्दिप्रार्थानिच्छन्तमव्याहतपक्ववेगम् ।
सुखान्वितं पुष्टिबलोपपन्नं विशुद्धरक्तं पुरुषं वदन्ति ॥५३॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने शिराब्यधविधिनाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

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रक्तशुद्धि के लक्षण—जिसका वर्ण प्रसन्न ( कान्ति = प्रभासम्भ्रम ) हो, ज्ञानेन्द्रियाँ प्रसन्न हों अर्थात् अपने-अपने विषय को ग्रहण करने में समर्थ हों, जो श्रोत्र आदि विषयों के अर्थों ( विषयों ) को ग्रहण करना चाहता हो, जिसकी पाचन क्रिया में किसी प्रकार की रुकावट न हो, जो सुख, पुष्टि तथा बल से युक्त हो, उस पुरुष को विशुद्ध रक्त वाला कहते हैं ॥५३॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिल्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में सिराब्यधविधि नामक सताईसवर्ग अध्याय समाप्त ॥ २७ ॥

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