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सर्वकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

प्रसृष्टे विष्णून्ने हृदि सुविमले दोषे स्वपथगे
विशुद्धे चोद्भारे क्षुद्रपगमने वातेऽनुसरति।

तथाऽग्रावुद्व्रित्ते विशदकरणे देहे च सुलघौ

प्रयुज्जीताहारं विधिनियमितं, कालः स हि मतः ॥ ५५ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने मात्राशित्तौयो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥


भोजन-समय का निर्देश —मल-मूत्र के भलीभाँति निकल जाने पर, हृदय के शुद्ध अतएव विमल हो जाने पर, वात आदि दोषों के अपने-अपने मार्ग की ओर प्रवृत्त हो जाने पर, शुद्ध ( दोषरहित ) डकार के आने पर, भूख के लगने पर, अपानवायु के अनुकूल ढंग से निकलने पर, जठराग्नि के प्रदीप्त हो जाने पर, इन्द्रियों के निर्मल हो जाने पर तथा शरीर के हलका हो जाने पर विधिपूर्वक आहार ( भोजन ) करें। यही आहार करने का उचित समय है ॥ ५५ ॥

वक्तव्य —इसी अध्याय के ३५वें श्लोक में ‘काले सात्स्यं शुचि हितं’ का यह उत्तर है। ऐसे समय में किया गया भोजन सम्पूर्ण इन्द्रियों सहित शरीर को तृप्त कर देता है। इस समय किये गये भोजन से जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है, लोभ आदि कारणों से इसके आगे-पीछे किया गया भोजन हानिकारक होता है। इस विषय में महर्षि पुनर्वसु के उपदेशों पर ध्यान दें। देखें—च.सू. २७।३४५ से ३५० तक।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

मात्राशित्तौय नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥