आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 134 में से
संदर्भ में पढ़ेंछायया भक्ता सती भुजा भवति । दीपोन्नतिरित्यर्थः । उदाहरणम् ।
दिगिभषोडशभ्रिस्तुल्ये छाये छायान्तरं तयोः ।
अर्कतुल्यं दीपभुजा तत्कोटी च निगद्यताम् ॥
प्रथमच्छाया १० । द्वितीयच्छाया १६ । छायाग्रयोरन्तरालभूमिः १२ । अत्र
प्रथमच्छायया लब्धा दीपकोटिः २० । दीपभुजा २४ । अथवा द्वितीयच्छायया
लब्धा दीपकोटिः ३२ । दीपभुजा २४ । छायाग्रे हि छायाकर्णमण्डलस्य मध्यं
भवति । अतश्छायाग्रात्कोटिकल्पना । दीपमूलस्थस्य शङ्कोर्हि छाया न भवति।
ततो बाह्ये क्रमेण छायावृद्धिस्यात् । तत्रैवं त्रैराशिकम् । यदि छायान्तरतुल्येन
छायाह्रासेन छायान्तरतुल्या भूमर्लभ्यते तदेष्टच्छायाग्रतुल्येन छायाह्रासेन का भू-
मिरिति छायाग्रदीपमूलान्तरालभूमिलब्धिः। यदिष्टच्छायाख्यकोट्या स्वशङ्कुभुजा
तदा दीपकोट्या का भुजेति दीपभुजालब्धिः । भुजाकोटिभ्यां कर्णानयनमा-
र्यार्धेनाह ।
भा०:-दीप से एक रेखा गत शङ्कु और छाया के अग्र का जहां मेल होता-
उस के बीच की जगह को इन दोनों में से एक छाया को घटा कर और दोनों
छाया के अन्तर तुल्य से भाग देवे, तो भागफल कोटी होगा । जो छाया गुण-
कार करके मानी गयी है उसके अग्र एवं दीप के मूल के बीच की भूमि वह
कोटी है उसको शङ्कु-गणित से "गुणकार" करके मानी हुई छाया से भाग
देने पर भागफल भुज होता है । अर्थात् दीपोन्नति होती है ॥ १६ ॥
यश्चैव भुजावर्गः कोटीवर्गश्च कर्णवर्गस्सः ।
भुजावर्गकोटीवर्गयोर्योगः कर्णवर्गस्यादित्यर्थः । शरे ज्ञाते जीवानयनम-
परार्धेनाह ।
भा०:-भुजा का वर्ग और कोटी का वर्ग का योग कर्णवर्ग होता है ॥
वृत्ते शरसंवर्गो ऽर्धज्यावर्गस्स खलु धनुषोः ॥ १७ ॥
वृत्तक्षेत्र इष्टचापस्या या समस्तज्या तन्मध्यादुभयपार्श्वगतौ यौ शरौ तयो-
स्संवर्गो यस्स खलु धनुषोः पूर्वोदितेष्टचापखण्डयोर्धज्यावर्गो भवति । इष्टोत्क्र-
मज्या प्रथमशरः । तदून समस्तविष्कम्भो द्वितीयशरः । कोटिकर्णयोगोऽ-
त्राधिकशरः । तदन्तरमूनशरः । तदाहतिर्हि तयोर्वर्गान्तरम् । इतीयं युक्तिः ।
वृत्तयोस्संवर्गे सति परिधिद्वययोगादेकस्मादितरपरिधिद्वययोगान्ता या जीवात-
न्मध्यादुभयपार्श्वगतशरद्वयानयनमाह।
भा०:-वृत्तक्षेत्रं में इष्टचाप की जो " पूर्णज्या" उस के बीच से जो उभय
पार्श्वगत शर का संवर्ग है, वह धनुष का पूर्वोक्त इष्ट चाप खण्ड का अर्द्धज्या-
वर्ग होगा ॥ १७ ॥