आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ
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८७) ६० ९
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लब्धं स्थानान्तरे तल्लब्धं स्थानान्तरत्वेन पङ्क्त्यां स्थाप्यमित्यर्थः ॥
घनमूलमाह ।
भा०- इकाई के स्थान् से आरम्भ करके प्रत्येक दूसरे अङ्कके ऊपर एक विन्दु
रक्खो, इस प्रकार पूरी राशि कई अंशों में बंट जावेगी, इन अंशों की संख्या
से वर्ग मूल के अङ्कों की संख्या जानी जायगी। वांई ओर के पहिले अंश में से
कौन सी सब से बड़ी संख्या का वर्ग घट सकता है, उसे निर्णय करो वही व-
र्गमूल का पहिला अङ्क होगा, उस को भाग की तरह दी हुई संख्या की दा-
हिनी ओर लिखो और उस के वर्ग को उसी वांई ओर के अंश में से घटा-
ओ । फिर बाकी पर दूसरे अंश अर्थात् आगेके दो अङ्कों को उतारो । इस प्र-
कार जो दो राशि बनेगीं उन को " भाज्य " मानो और उस भाज्य के दा-
हिने के एक अङ्क को छोड़ कर उस में पहिली वर्गमूल संख्या के दूने का भा-
ग दो और भागफल को उसी मूल की दाहिनी ओर " भाजक " की दा-
हिनी ओर लिखो । फिर उस भाजक को मूल के शेष अङ्क से गुणा करके गु-
णन फल को भाज्य में से घटाओ । फिर और और सब अंशों को उतार कर
पहिले की तरह कार्य करो ।
उदाहरणः-
२२०९ का वर्गमूल बताओ ।
२२०९ ( ४७
१६
८७) ६० ९
६० ९
यहां पहिला अंश २२ है । सब से बड़ी संख्या के वर्ग १६ को २२ में से
घटा सकते हैं। इस लिये ४ ही वर्गमूल का पहिला अङ्क होगा । पहिले अंश
२२ में से १६ घटाने से ६ शेष रहे । दूसरा अंश ०९ को ६ की दाहिनी ओर
उतारने से ६०९ हुए । ६०९ के ९ को छोड़ देने से ६० रहे । ६० में मूल के अ-
ङ्क ४ के दूने अर्थात् ८ का भाग देने से भागफल ७ हुआ । ७ को ४ के दाहि-
नी ओर ८ के दाहिने लिखो। फिर ८७ को ७ सेगुणा करके गुणन फल ६०९ में से
घटाने से बाकी कुछ नहीं रहा; इस लिये ४७ इष्ट वर्गमूल हुआ ॥ ४ ॥