अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 84 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ अर्थसंग्रहः—
मिति बोधयता सर्ववेदस्य प्रयोजनवदर्थपर्यवसायित्वं सूचयतोपात्तत्वेना-
नर्थक्यानुपपत्तेः ।
प्राशस्त्य अथवा निन्दा-परक वाक्यको अर्थवाद कहते हैं। जहां पर 'वायु-
र्वै क्षेपिष्ठा'—इत्यादि अर्थवाद वाक्य स्थलमें प्राशस्त्य अथवा निन्दा बोधक वाक्य
नहीं है वहां पर भी लक्षणासे प्रयोजनवाला अर्थका बोधक होगा । क्योंकि अर्थ-
वाद वाक्यका स्वार्थ प्रतिपादनमें कोई प्रयोजन नहीं रहता है । अतः विधि
वाक्यको विधेयके प्राशस्त्यमें और निषेधको निषेध्यकी निन्दामें लक्षणा
होती है । केवल स्वार्थमात्रका प्रतिपादन करनेसे व्यर्थ हो जायगा । क्योंकि
समस्त वेदोंको क्रियाका प्रतिपादक मानते हैं इसलिए सिद्धार्थका प्रतिपादन
द्वारा स्वार्थमात्रपरक मानकर चरितार्थ करना उचित नहीं है । वैयर्थ्यकी इष्टा-
पत्ति नहीं कर सकते हैं क्योंकि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' यह अध्ययन विधि सारे
वेदोंके अध्ययनकर्तव्यको समझाती हुई सकल वेदोंको प्रयोजनवदर्थपरक
कहती है इसलिए अनर्थक नहीं हो सकता है ।
अर्थवादविभागः ।
स द्विविधः —विधिशेषो निषेधशेषश्चेति । तत्र 'वायव्यं श्वेतमालभेत
भूतिकाम' इत्यादिविधिशेषस्य 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवते'त्यादेर्विधेयार्थप्राश-
स्त्यबोधकतयार्थवत्त्वम् । 'बर्हिषि रजतं न देय'मित्यादिनिषेधशेषस्य,
'सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वमि'त्यादेर्निषेध्यस्य निन्दितत्वबोधकतया-
र्थवत्त्वम् । न च प्राशस्त्यादिबोधस्य निष्प्रयोजनत्वेन नार्थवादस्यार्थवत्त्व-
मिति वाच्यम् । आलस्यादिवशादप्रवर्तमानस्य पुंसः प्रवृत्त्यादिजनकत्वेन
तद्बोधस्योपयोगात् ।
अर्थवादके दो भेद हैं विधि शेष और निषेध शेष । उनमें 'वायव्यं श्वेत-
मालभेत भूतिकामः' इस विधिका शेष 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता' इत्यादि मंत्र है ।
वह मंत्र विधेय भूत उक्त यज्ञादि कर्म रूप अर्थमें प्राशस्त्यका लक्षणासे बोधन
द्वारा प्रवर्तक होनेसे सार्थक होता है । अर्थात् वायु (क्षेपिष्ठा) शीघ्र चलने वाले
देवता हैं अतः वायु देवता निमित्तक कर्म अत्यन्त प्रशस्त है इस तरह बोध
होनेसे श्रेष्ठजनों की उसमें प्रवृत्ति होती है । 'बर्हिषि रजतं न देयम्' इत्यादि
निषेधका शेष (सोऽरोदीत्) इत्यादि है । यह लक्षणासे निषेध्य रजतादि की
निन्दाका बोधन द्वारा सार्थक होता है । प्राशस्त्यादि बोधनका कोई प्रयोजन