अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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अग्न्याधानमें भी शूद्रको अधिकार नहीं है । यद्यपि 'रथकारोऽग्नीनादधीत', इस
वाक्यसे रथकार ( शूद्रविशेष ) को भी अग्न्याधानमें अधिकार कहा गया है ।
यहां पर 'रथं करोती'ति इस विग्रहसे त्रैवर्णिकका ग्रहण नहीं होता है किन्तु
'योगाद् रूढिर्बलीयसी' योगसे रूढि बलवती होती है इस नियमसे जातिविशेष
वाचक ही रथकार शब्द है । अर्थात् वैश्यामें क्षत्रियसे उत्पन्नको माहिष्य कहते हैं
और शूद्रामें वैश्यसे उत्पन्नको करणी कहते हैं और करणीमें माहिष्यसे उत्पन्नको
रथकार कहते हैं । श्रीयाज्ञवल्क्य मुनिका वचन भी है—'माहिष्येण करण्यान्तु रथकारः
प्रजायते' इति । तथापि इस रथकारको उत्तरकर्ममें अधिकार नहीं है । जिस यागमें
उक्त वचनसे शूद्रका अधिकार हो उस यागमें भी अपूर्वविद्याकी कल्पना करके ही
अधिकार होता है दूसरे यागोंमें नहीं ।
एवं सामर्थ्यमपि 'आख्यातानामर्थं ब्रुवतां शक्तिः सहकारिणी'ति
न्यायान् समर्थं प्रत्येव विधिप्रवृत्तेः । तदेवं निरूपितो विधिः ।
इसी तरह विधिवाक्योंमें अश्रुत सामर्थ्य भी अधिकारीका विशेषण होता है !
क्योंकि 'अर्थको कहनेमें आख्यात ( तिङन्त-यजेत ) का सहकारी कारण सामर्थ्य
( शक्ति ) होता है' इस न्यायसे समर्थ अधिकारीको उद्देश्य करके विधिकी
प्रवृत्ति होती है । अधिकारीमें सामर्थ्यविशेषण देनेसे यह सूचित होता है कि
अन्ध और बधिर प्रभृतिको यागमें अधिकार नहीं है । यहां पर यह विचारणीय
विषय है कि अन्ध और बधिर प्रभृति जब चेतन हैं तब उनको भी निरतिशय-
सुखरूप स्वर्गकी इच्छा हो सकती है अतः यागमें उनका अधिकार क्यों नहीं है ।
यदि कहें कि अन्धको आज्य देखनेका सामर्थ्य नहीं है एवं बधिरको अध्वर्युप्रोक्त-
मन्त्रश्रवणका सामर्थ्य नहीं है अतः यागमें अधिकार नहीं है तो भी वे यथाशक्ति
अंगों का अनुष्ठान कर सकते हैं । क्योंकि 'यजेत स्वर्गकामः' इस प्रधानवाक्यसे
सबको अधिकार की प्रतीति होती है अतः अन्धप्रभृतिको भी यागमें अधिकार
होना चाहिये । इसका उत्तर कहते हैं कि यदि आज्यादिका अवेक्षणादि पुरुषार्थरूप
से विहित किया जाता तो अवेक्षणादि-सामर्थ्य न रहने पर भी यागमें वैकल्य
( अङ्गका नाश ) नहीं होता किन्तु अवेक्षण ( देखना ) प्रभृति यागका ही अंग
रूपसे विहित है । उस अंगको नहीं करने पर यागमें वैकल्य होनेसे यागका सम्पन्न
नहीं होगा अतः यागमें अन्धप्रभृति असमर्थोंका अधिकार नहीं है । इस तरहसे
विधिका निरूपण हुआ ॥