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अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 84 में से

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पृष्ठ 33

दीपिकाटीकासहितः। २७
जुष्टं निर्वपामि' इसमन्त्रका निर्वाप ( त्याग ) प्रकाशन सामर्थ्यरूप लिंगसे निर्वापमें
विनियोग होता है क्योंकि जिस मन्त्रमें जिस अर्थ का प्रकाशन सामर्थ्य है वह
उसका अङ्ग होता है। यहां पर यह जानने योग्य बात है कि लिंग के दो भेद
हैं—संबन्ध सामान्य बोधक प्रमाणान्तरनिरपेक्ष और सम्बन्धसामान्य बोधक-
प्रमाणान्तरसापेक्ष । उनमें जिसके बिना जो असम्भव हो वह सम्बन्ध सामान्य
बोधक प्रमाणान्तरकी अपेक्षा रहित केवल लिंगसे उसका अंग होता है। जैसे
अर्थ ज्ञानके बिना कर्मानुष्ठान असम्भव है इसलिये अर्थज्ञान कर्मानुष्ठानका अंग
केवल लिंगसे होता है। जिसके बिना भी जो होसके वह सम्बन्ध सामान्य
बोधक प्रमाणान्तरसापेक्ष लिंगसे उसका अंग होता है। जैसे 'अग्नये जुष्टं निर्वपामि'
यह मन्त्र निर्वापका अङ्ग है क्योंकि इस मंत्रके बिना भी उपायान्तरसे स्मरणकर
निर्वाप हो सकता है। अतः यह मन्त्र निर्वापस्वरूप बोधक नहीं है अपितु
अपूर्वके कारणीभूत निर्वाप प्रकाशनार्थ है किन्तु केवल सामर्थ्यरूप लिङ्गसे मन्त्र,
अपूर्व कारणीभूत निर्वाप प्रकाशनार्थ नहीं हो सकता है क्योंकि इस मन्त्रमें केवल
निर्वापप्रकाशन सामर्थ्य ही है इसलिये सम्बन्ध सामान्य बोधक प्रकरणादि प्रमा-
णान्तर को अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा तब दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें इस मन्त्रका
पाठ है इसलिये दर्शपूर्णमासके अपूर्व सम्बन्धी कुछ प्रकाशित होता है यह
कल्पना करेंगे। दर्शपूर्णमासका अपूर्वसम्बन्धी क्या प्रकाशित होता है ऐसी
आकांक्षा होनेपर निर्वापप्रकाशन सामर्थ्यरूप लिंगसे पुरोडाश निर्वापका बोध
होता है। अतः 'अग्नये जुष्टं' यह मन्त्र निर्वापका अंग है यह सिद्ध हुआ। यह
लिंग वाक्यसे प्रबल है। अतएव ( वाक्यसे लिंगको प्रबल होनेके कारण )
'स्योनं ते सदनं कृणोमि' यह मन्त्र सदनकरण प्रकाशन सामर्थ्यरूप-'सदनं
कृणोमि' इस लिंगसे पुरोडाश सदन करणके प्रति अंग होता है किन्तु 'सदनं
कृणोमि' 'तस्मिन् सीद' इस तरह सहोच्चारणरूप वाक्यसे सम्पूर्ण मन्त्र पुरोडाश
सदन करणके प्रति और पुरोडाश स्थापनाके प्रति अंग नहीं होता है। उसका
यह अभिप्राय है कि 'स्योनं ते सदनं कृणोमि' यहां पर “घृतस्य धारया सुशेवं
कल्पयामि तस्मिन् सीदामृते प्रतितिष्ठ, व्रीहीणां मेध, सुमनस्यमान” यह वाक्य
शेष है। इसका अर्थ यह है कि हे पुरोडाश ! तुम्हारा (स्योनं) समीचीन (सदनं)
स्थान मैंने ( कृणोमि ) किया है उस स्थानको ( घृतस्य धारया ) घृतकी धारासे
(सुशेवं) अच्छी तरह सेवनके योग्य करता हूँ। ( व्रीहीणां मेध ) हे धानोंके सारभूत
३ अ० सं०