अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व मंगलाचरण
श्रीः ।
✤ अपरोक्षाऽनुभूतिः ✤
श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य-
शंकराचार्यविरचिता ।
श्रीस्वामिविद्यारण्यमुनिकृतया
दीपिकया
श्रीयुतभोलानाथात्मजपण्डितरामस्वरूप
द्विवेदिकृतभाषानुवादेन च समलंकृता ।
सेयं
श्रीकृष्णदासात्मजखेमराजेन
मुम्बय्यां
स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्-यन्त्रालये
मुद्रयित्वा प्रकाशिता.
भाद्रपद संवत् १९६५, शके १८३०.
इस पुस्तकका सब रजिस्टरी हक़ यन्त्रा-
धिकारीने स्वाधीन रक्खा है.
भूमिका.
प्रगट हो कि कलिकालमें पुरुष अनेक दुःखोंसे दुःखित रहते
हैं और सबही चाहतेहैं कि हमारा दुःख दूर हो जाय इस विष-
यमें विचार यहहै कि संसारके दुःख यद्यपि क्षण घडी महीना
वर्ष इत्यादि नियमित कालकी औषध मंत्रादिकोंसेभी दूर होस
क्तेहैं परन्तु अत्यन्त नाशको प्राप्त नहीं होसक्ते कि जिससे
दुःखसागरसे पीछा छूटे क्योंकि मुक्तितौ ब्रह्मज्ञानके विना क-
दापि नहीं होसक्ती जैसा कि यजुर्वेदकी श्रुतिका अभिप्रायहै,
“तमेव विदित्वातिमृत्युमेतिनान्यः पन्थाविद्यतेऽयनाय” उसब्र-
ह्मकाही साक्षात्कार कर मुक्तिको प्राप्तहोताहै अन्य कोई उपाय
मुक्तिके प्राप्त होनेका नहींहै, इसप्रकार संसारको क्लेशित देखके
“परिव्राजकाचार्य्य श्रीमच्छंकराचार्य्यजी” अपरोक्षानुभूतिको
रचतेभए जिसमें संक्षेपसे वेदान्त प्रक्रिया सरलरीतिसे वर्णन
करीहै और इसकी संस्कृतटीकाभीहुई परन्तु ऐसे पुरुष ब-
हुत कम होतेहैं जोकि मूल अथवा संस्कृतटीकाको समझ सकें
और जो समझसकैहैं इनकोतौ संस्कृतटीकाका भी कोई कामन-
हींहै केवल संस्कृतका किञ्चिन्मात्र ज्ञान रखनेवाले सत्पुरुषोंके
अर्थ इस पुस्तककी स्वरूपप्रकाशिका नामवाली भाषाटीका
अति स्पष्ट बनाईहै इस मेरे श्रमको देख सज्जनपुरुषोंको अवश्य
आह्लाद होगा ।
श्रीयुत भोलानाथात्मज पण्डित रामस्वरूप द्विवेदी.