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अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतकाटीका-भाषाटीकासहिता । ( ४३ )
प्रसिद्धौ श्रुत्या "नेह नानास्तिकिंचन" इत्यादिरूपये-
त्यर्थः । नानात्वं निवारितं तेन च नानात्वनिवारणे-
नाद्वयकारणेऽभिन्ननिमित्तोपादाने ब्रह्मणि स्थिते सति
भासो व्याप्यव्यापकतादिप्रतिभासाः कार्यभूतोऽन्यः
स्वकारणातिरिक्तः कथं भवेन्नकथं चिदित्यर्थः ॥ ४७ ॥
भा. टी. वेदकी श्रुति साक्षात् आप जगत्का नानात्व
निवारण करै है इसप्रकार ब्रह्म अद्वितीय अर्थात् कारण होने-
करिकै किसप्रकार भेदज्ञान होसकै है ॥ ४७ ॥
दोषोपि विहितः श्रुत्या मृत्योर्मृत्युं स-
गच्छति॥ इह पश्यति नानात्वं माय-
या वंचितो नरः ॥ ४८ ॥
सं. टी. किंच भेददृष्टेदोषश्रवणादपि कारणादभि
न्नमेव कार्यमित्याह दोषइति। "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति
य इह नानेव पश्यति" इत्यादिरूपया श्रुत्येत्यर्थः तत्र
मृत्योरनंतरं मृत्युं जननमरणपरंपरामित्यर्थः स्पष्ट-
मन्यत् ॥ ४८ ॥
भा. टी: "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति यइह नानेव पश्यति"
अर्थात् जो संसारको नानारूप माना है उसको वारंवार जन्म
मृत्यु नरक भोग करना पडैहै।इत्यादि श्रुतिद्वारा जो नानात्व
प्रदर्शन करै हैं । उनको दोष होयहै ऐसाभी कहाहै ।