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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 109 में से

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पृष्ठ 33

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (२७)
एवमुत्तरत्रापि ज्ञेयं पुनरुक्तिस्तु ज्ञानप्रतिबंधकस्य बु-
द्धिमांद्यविपर्ययादेर्दाढर्यान्नाशंकनीया ॥ २५ ॥
भा. टी. मैं निर्विकारहूं अर्थात् सदा एकरूपहूं । निरा-
कार अर्थात् मेरा कोई आकार नहीं है । मैं निरवयहूं अर्थात्
आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिक इन तीन तापों करकै
रहितहूं और अविनाशीहूं । नाशवान् देह नहीं हूं । इस प्रकार
ज्ञानको पण्डितगण तत्त्वज्ञान कहैं हैं ॥ २५ ॥
निरामयो निराभासो निर्विकल्पोऽह-
माततः ॥ नाहं देहो ह्यसद्रूपो ज्ञानमि-
त्युच्यते बुधैः ॥ २६ ॥
सं. टी. पुनः किंलक्षणं ज्ञानमित्यत आह निरामय
इति। अहं निरामयः सर्वरोगरहितःनिराभासो वृत्तिव्या-
प्यत्वेपि फलव्याप्यत्वशून्यः निर्विकल्पः कल्पनाही-
नः आततश्च व्यापकः ॥ २६ ॥
भा. टी. मैं रोगहीनहूं अर्थात् मुझे राजयक्ष्मादिरोग नहीं
होयहैं मुझे फलकी अभिलाषा नहीं होयहै मैं कल्पना नहीं
करूंहूं और सर्वव्यापीहूं । मैं नाशवान् देह नहींहूं इस प्रकार
ज्ञानको पण्डित जन तत्त्वज्ञान कहैं हैं ॥ २६ ॥
निर्गुणो निष्क्रियो नित्यो नित्यमुक्तो
ऽहमच्युतः॥ नाहं देहो ह्यसद्रूपो ज्ञान
मित्यच्यते बुधैः ॥ २७ ॥