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अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (१९)
कलाभिः श्रोत्रादिबुद्ध्यंताभिः सप्तदशभिरावृत आ-
च्छादितस्तत्संघात इत्यर्थः अतएव लिंगदेहस्य निरव-
यवत्वाद्यभावात् ज्ञानेन तत्कारणाऽज्ञाननिवृत्तौ निवृ-
त्तिरन्यथाऽनिर्मोक्षप्रसंग इतिभावः एवमतिवैलक्षण्ये
सत्यपि तयोरात्मदेहयोः प्रकाशतमसोरिवैक्यमैका-
त्म्यं प्रपश्यंति तार्किकादयइत्यर्थः अतो विपरीतद-
र्शनात्परमन्यदज्ञानं किमस्ति एतदेवाज्ञानमित्यर्थः
विपर्ययरूपकार्यान्यथानुपपत्त्या तत्कारणं मूलाऽज्ञानं
कल्प्यत इतिभावः ॥ १७ ॥
भा. टी. आत्मा विनिष्कल अर्थात् अवयवहीनहै इसी
कारण एक है और देह बहुत अवयवोंसे बना है तबभी संसार
बन्धनमें फँसेहुए पुरुष आत्मा और देहकी ऐक्यता कर व्यव-
हार करते हैं इससे अधिक और क्या अज्ञान होगा ॥ १७॥
आत्मा नियामकश्चान्तर्देहो बाह्यो
नियम्यकः ॥ तयोरैक्यं प्रपश्यन्ति
किमज्ञानमतः परम् ॥ १८ ॥
सं. टी. पुनर्वैलक्षण्यमाह आत्मेति आत्मा नियाम-
को नियंता च पुनरंतः पंचकोशांतरः देहस्तु नियम्यः
सन् बाह्यः तयोरैक्यमित्युत्तरार्द्धं व्याख्यातं एवमग्रेपि
ज्ञेयम् ॥ १८ ॥

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