अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ ) अपरोक्षानुभूतिः ।
विवेकादिक्रमेण हेतुहेतुमद्भावस्तथापि वैराग्यस्या-
साधारणकारणतां द्योतयितुमादौ ग्रहणं कृतमिति
बोद्धव्यम् ॥ ३ ॥
भा. टी. अपने २ वर्णका धर्म धारण करनेसे अर्थात् ब्राह्म-
णोंको पढना पढाना यज्ञकरना यज्ञकराना दानलेना दान देना
इन ६ छः कर्मोंकरके क्षत्रियको प्रजापालन करनेसे वैश्यको
खेतीका कर्म करनेसे शूद्रको ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यकी सेवा
करनेसे और आश्रमधर्म धारण करनेसे अर्थात् ब्रह्मचर्य्य-
अवस्थामें गुरुसेवन करनेसे गृहस्थ अवस्थामें पुत्र उत्पन्न
करनेसे वानप्रस्थ अवस्थामें स्त्रीसहित तथा इकल्ला जाकर
ब्रह्मचर्य धारणकर अग्निहोत्रादि कर्म्म तथा ईश्वरकी आरा-
धना करनेसे सन्यस्त अवस्थामें सर्व कर्म्म त्याग करनेसे
और चान्द्रायणादि व्रत करनेसे हरिकीर्त्तनकर ईश्वरको प्रसन्न
करनेसे मनुष्यको वैराग्य, नित्य अनित्य वस्तुका विवेक,
- शम दम आदि सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व, यह चार साधन
प्राप्त होय हैं ॥ ३ ॥
( वैराग्यस्वरूप )
ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु वैराग्यं विषये-
ष्वनु ॥ यथैव काकविष्ठायां वैराग्यं:
तद्धि निर्मलम् ॥ ४ ॥