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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

114 अपराजितपृच्छा
तां च पीत्वा कलिर्जातो मथनस्य विसर्जनम् ॥ ३९ ॥
अर्थक्षया शौचभ्रंशा गूढमन्त्रप्रकाशिका ।
नष्टकार्या तनुकृष्टा चागम्यागमपापदा ॥ ४० ॥
(एक बार) पुनः सागर का मन्थन किए जाने पर उसमें से कलियुग (क्लेश)
स्वरूप मदिरा निकली जिसको पीने से कलियुग का प्रादुर्भाव हो गया और सागर
मन्थन का अन्त हो गया। तब से मदिरा पीने वाले में कई अवगुण प्रकट होने लगे।
यथा— वह व्यक्ति के धन का क्षय करती, उसकी पवित्रता का विनाश करती,
उसके गुप्त विचारों को प्रकट कर देती और उसके समस्त कार्यों को नष्टकर डालती
है, वह उसके विवेक का हरण कर लेती है जिससे वह बहन-बेटी, माता-गुरुपत्नी
आदि अगम्या के साथ भी दुराचार करने में प्रवृत्त कर देती है और ऐसे जघन्य पाप
करवाती है।
अधर्मकलिकोद्भावा गृहच्छिद्रादिकारिका ।
तथा त्यक्तोत्तमस्नेहा मृतनिर्गतचेतना ॥ ४१ ॥
एवं निन्द्यगुणैर्युक्ता मदिरा पानतः कृता ।
मुक्ता यैः सा स्वहितैश्च तेषां श्रीर्बलवर्द्धिनी ॥ ४२ ॥
इसी प्रकार कलियुग के सभी अधर्मों को कराने वाली, गृह की रहस्यों को
खोलकर परिवार के स्नेह, प्रेम व्यवहार को छुड़ा देती है और मदिरा पीने वाले
व्यक्तियों की चेतना को मृत कर देती है। इस प्रकार के निन्द्य गुणों से मदिरापायीयुक्त
होकर बरबाद हो जाता है। इसके विपरीत, जो समझदार व्यक्ति इसके अवगुणों को
समझकर इससे मुक्त हो जाता है, वह अपना स्वयं का ही हित कर लेता है और ऐसे
लोगों का धन व बलवर्धिनी वह त्यागी गई मदिरा स्वयं बन जाती है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां कूर्मावतारे
मन्दरमन्थनाधिकारो नाम चतुर्विंशं सूत्रम् ॥ २४ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में कूर्मावतार
मन्दार मन्थन अधिकार नामक चौबीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
वराहावतारो नाम पञ्चविंशं सूत्रम् ॥ २५ ॥
अपराजित उवाच —
पृथिव्यां सागरा द्वीपाः सशैलवनकाननाः ।

? Wait, look at the Hindi translation: "भगवान् विष्णु के पास पुकार करने पहुँचे" "के पास" translates "पार्श्वे" (locative) or "पार्श्वम्" (accusative). In Sanskrit, "विष्णुपाश्र्वे गताः" or "विष्णुपाश्र्वं गताः"? Either way, let's look at the character: it looks like विष्णुपाश्र्वंorविष्णुपाश्र्वे? Wait, look at the dot: is there a dot? No, wait! There is no dot! That little speck is just paper texture, or is it a dot? Wait, look at the stroke: it is विष्णुपाश्र्वे! Wait, let me look at विष्णुपाश्र्वंagain. Actually, let's look atपादोऽधर्मस्यin L13:दोhas an o-matra. Wait, let's look atविष्णुपाश्र्वं: Wait, between पाandगताः: Letter is: प, ा, श, ्, र, व, े ? Wait, look at the loop: is it श्र्वorश्व? In विश्वकर्मोवाच(L5):श्वhasशjoined toव. Notice how शjoinsव`: it doesn't have a full vertical bar, the round part connects directly

116 अपराजितपृच्छा
कृतयुग के आधे बीत जाने पर चैत्र मास के कृष्णपक्ष की जया तिथि
(तृतीया) को सूर्य नामक मुहूर्त (तृतीय मैत्र¹ संज्ञक मुहूर्त) के अन्त में, हस्त नक्षत्र
के अन्तिम चरण में, दो घटिका शेष रहते महोत्कट महाविशाल, अकल्पनीय प्रमाण
वाले वराह के रूप में फड़कती हुई भ्रुकुटी और किटकिटाते हुए दाँतों और अत्यन्त
प्रकाशमान तेजपुञ्ज से समुद्भव अर्थात् उत्पन्न होकर इस शैल-द्वीप-सागर से युक्त
पृथ्वी को अपने दाढ़ के आगे के भाग पर धारण करके सभी देवताओं से सम्पूजित
होकर पृथ्वीधर होता हुआ पुनः आऊँगा।
तथा च वराहावतार वर्णनं —
पुष्करे परमेश्वरो नासाग्रे पवनात्मकः।
वलिका ऊर्ध्वकेशेषु शम्भुसृष्टिसमुद्भवः॥ 9 ॥
(देवताओं को इस आश्वासन के बाद) भगवान् विष्णु परमेश्वर जल के तालाब
में नाक से आगे पवन की फुफकार छोड़ते हुए अपने आयाल के ऊँचे-ऊँचे केशों
सहित भगवान् शिव की सृष्टि में उत्पन्न हुए।
अधरैश्चाधकोद्भूतं ? दंष्ट्रायां शैलसम्भवः।
सरस्वती च जिह्वायां तालुकेऽमरकोटयः ॥ 10 ॥
ग्रीवायां सुरसङ्घाश्च ओष्ठयोश्चासुरास्तथा।
कपाले कार्मुककरश्चन्द्राकौ चेव नेत्रयोः ॥ 11 ॥
कर्णयोश्चैव गन्धर्वास्त्रिकोटिः सार्धमस्तके।
पृष्ठोपरि तथा मेरुर्लिङ्गाकारेण संस्थितः ॥ 12 ॥
अधरों के नीचे से निम्न भाग उद्भूत होता जान पड़ा तो दाढ़ों से पहाड़ बने हों,
ऐसी छवि थी। जिह्वा में सरस्वती को बसाकर और तालू में करोड़ों देवताओं को
बसाकर, गले में देवताओं के समूहों को बसाकर और ओठों पर असुरों को

  1. मुहूर्ततत्त्व में आया है कि दिन के 15 मुहूर्तों के लिए दिनमान में 15 का भाग देकर एक मुहूर्त का
    घट्यात्मक मान निकाला जा सकता है। दिन के ये मुहूर्त-स्वामी क्रमशः निम्नलिखित हैं- 1. ईश, 2.
    सर्प, 3. मित्र, 4. पितृ, 5. वसु, 6. सलिल, 7. विश्वेदेव, 8. अभिजित् (विधि), 9. विधाता, 10. इन्द्र,
  2. इन्द्राग्नि, 12. राक्षस अथवा निर्ऋति, 13. अम्बुनाथ, 14. अर्यमा और 15. भग¬ अह्रीशः
    सर्पमित्रौपितृवसुसलिलं विश्वकौकश्च वज्रीन्द्राग्नी रक्षोम्बुनाथार्यमभगमथोर्ध्वेभिज्धान इष्टः । (मुहूर्ततत्त्व 1,
  1. विष्णुधर्मोत्तरपुराण में वज्र के प्रश्न पर मार्कण्डेय का कथन है- दिनरात्र्योस्समारम्भे ह्यर्धं भवति
    पार्थिव॥ तयोर्मध्ये च सततमभिजित्त्वाभिधीयते। तयोर्द्वित्वान्मया त्रिंशन्मुहूर्ता विहितास्तव॥
    नक्षत्रैर्दैवतैस्तेषां देवताः परिकीर्तिताः। केवलं क्रमहानिश्च क्रमस्तेषां निबोध मे॥ रौद्रस्सार्पस्तथा मैत्रः पैत्रो
    वासव एव च। आप्यो वैश्वस्तथा राजन्केश्वरः शक्रदैवतः॥ ऐन्द्राग्नेयो नैर्ऋतस्तु वारुणश्च महीपते।

सूत्र-२५ 117
बसाकर, कपाल में धनुषाकार को, चन्द्रमा व सूर्य को नेत्रों में धारण करके, कानों
और मस्तक में साढ़े तीन करोड़ गन्धर्वों को, पीठ पर और मेरु पर्वत को लिङ्गाकार
में स्थापित किया।
पञ्चवक्त्रो महादिव्यो व्योमव्यापी सदाशिवः।
तस्य प्रदक्षिण मेरुर्भुवनानि चतुर्दश₁₄ ॥ 13 ॥
स्थिताश्चैकादश₁₁ रुद्रा द्वादशादित्यकास्तथा₁₂ ।
चतुर्दशमन्वश्च₁₄ त्रिदशास्स्युरनेकधा ॥ 14 ॥
(इसी प्रकार) यह महान वराह का स्वरूप एक प्रकार से महादिव्य व्योम
व्यापी सदाशिव का ही पञ्चवक्त्र स्वरूप है जिसके मेरु शिखर के चतुर्दिक चौदह
भुवन प्रदक्षिणा करते हैं। इस वराह अवतार के स्वरूप में एकादश रुद्र और द्वादश
आदित्य, चौदह मनु और अनेक देवता अवस्थित हैं।
उभयोर्गिरिगोत्राश्च भुजयोः शैलजास्तथ।
कर्णिकायां च संसारो मणिबन्धे महोत्कटाः ॥ 15 ॥
इन्द्रः खुरेषु गन्धर्वाः क्षुररन्ध्रुषु पन्नगाः।
क्षुराग्रे चाश्विनौ देवौ जानुसन्धौ च रुग्व्ययः ॥ 16 ॥
अहिला( ?जा ) हृदयदेशे जठरे जगतो धृतिः।
कुक्षौ ससार्णवाः प्रोक्ताः पुच्छे सृष्टिकरस्तथा ॥ 17 ॥
भगवान् वराह की दोनों भुजाओं में गिरिगोत्रा, पहाड़ों का समूह तथा शैलजा
पहाड़ी चोटियों का समूह स्थित है। श्रीवराह के कानों में और कलाइयों में
महोत्कट संसार स्थित है। उनके पाँवों के खुरों में इन्द्र और गन्धर्वों का वास है
जबकि खुरों के मध्य में रन्ध्र, रिक्त स्थान में पन्नग-सर्पों का वास है। खुरों के
अग्रभाग में अश्विनीकुमारों का वास है। जङ्घा के सन्धि में सभी रोगों का नाश करने
वाले तत्त्वों का वास है। अहिला (जा) साँपों के वंशज वराह के हृदयदेश में और
समस्त जगत को वराह ने अपने पेट में धारण कर रखा है। श्रीवराह के दोनों कुक्षों
में सातों महासागरों का वास कहा है और श्रीवराह की पुच्छ में सृष्टिकार ब्रह्मा का
वास है।
तदूर्ध्वं कूर्मरूपं तु कूर्मोर्ध्वे गरुडो मतः।
पञ्चद्वे₂₅ तत्त्वानि यतः स्मृतः सृष्टिसमुद्भवः ॥ 18 ॥
पञ्चतत्त्वोद्भवा सृष्टिः ख्यातः संसारसागरः ।
एवमाद्योद्भवो देवः संसाराच्च समुद्धरेत् ॥ 19 ॥

118 अपराजितपृच्छा
पापात्समुद्धरेद्येन लीलया धार्यते महीम् ।
खुणमध्यगतो यस्य मेरुः खुणरखुणायते ॥ २० ॥
इससे ऊपर कूर्म रूप है और कूर्म के ऊपर गरुड़ माना गया है। इससे आगे
पच्चीस ( पञ्च द्वे 5 × 5 = 25 ) तत्त्व कहे गए हैं जिनसे सृष्टि उत्पन्न हुई है। यूँ
पञ्चतत्त्वों से इस सृष्टि में संसार, सागरादि की उत्पत्ति विख्यात् है। उसी आदिकाल
में उत्पन्न होने वाले संसार का श्रीवराहदेव ने बड़ी लीला से अर्थात् खेल-खेल में
आसानी से मही अर्थात् पृथ्वी को धारण करके पाप से समुद्धरित किया।
पातालं यस्य कुक्षौ सकलशिखरिणो मन्दरो मेरुकाद्याः
दंष्ट्राग्रे यस्य लग्ना त्रिभुवनसहिता मेदिनी सागरान्ता ।
आरक्ते यस्य नेत्रे सुरभिसुरदितं घर्घरं यस्य काले
द्वौ कर्णौ भुजगदृष्टि कपट तनुकृत ? पातु वः श्रीवराहः ॥ 21 ॥
श्रीवराह के कुक्षों में पाताल के समस्त गिरि शिखिर मन्दराचल, सुमेरु आदि
का वास है और श्रीवराह के दाँतली में त्रिभुवन सहिता यह सागरान्त महि-मेदिनी
टिकी हुई है, लगी हुई है। श्रीवराह के लाल-लाल नेत्रों में सुरभि, सुर व दैत्य
( ? ) बसते हैं और उनके घर्घर शब्द में, गुरनी में काल का वास है। दोनों कान
ऐसे फैले हैं मानो फन फैलाई हुई भुजङ्ग की दृष्टि हो। इस प्रकार के कपट तनु,
छलिया रूप वाले श्रीवराह हमारी रक्षा करें।¹
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
वराहावतारनिर्णयाधिकारो नाम पञ्चविंशं सूत्रम् ॥ 25 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में
वराहावतार निर्णय अधिकार नामक पचीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 25 ॥

  1. मत्स्यपुराण में यज्ञवराह का स्वरूप इस प्रकार आया है— वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश् चितीमुखः ।
    अग्निजिह्वो दर्भलोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः । अहोरात्रेक्षणधरो वेदाङ्गश्रुतिविभूषणः ॥ आज्यनासः स्रुवतुण्डः
    सामघोषस्वनो महान् । सत्यधर्ममयो श्रीमान् कर्मविकर्मसत्कृतः ॥ प्रायश्चित्तनखो घोरः पशुजानुर्मखाकृतिः ।
    उद्गीथहोमलिङ्गोऽथ बीजौषधि महाफलः ॥ वाव्यन्तरात्मा यज्ञास्थितिविकृतिः सोमशोणितः । वेदस्कन्धो
    हविर्गन्धो हव्यकव्यविभागवान् ॥ प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरन्वितः । दक्षिणाहृदयो योगी
    महासत्रमयो महान् ॥ उपाकर्मौष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः । नानाछन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः ।
    छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छितः ॥ ( मत्स्य आनन्द आश्रम संस्करण पृष्ठ २४० (१३-२८)।

सूत्र-२६ 119
नृसिंहवामनावतारो नाम षड्विंशं सूत्रम् ॥ २६ ॥
अपराजित उवाच -
हिरण्यकशिपुर्घोरो जातः कस्मादुपायतः ।
अफलं वर्धितं केन ? कथयस्व प्रसादतः ॥ १ ॥
अपराजित बोले - महाघोर दुर्दान्त हिरण्यकशिपु किस उपाय से उत्पन्न हुआ ? हे
तात ! कृपा करके इस बारे में कहिए कि इससे क्या-क्या अफल-निष्फल कार्य हुए।
विश्वकर्मोवाच -
हिरण्यकशिपुं पूर्वं कथयिष्यामि साम्प्रतम् ।
महोत्कटश्च येनाऽसाववध्यो देवदानवैः ॥ २ ॥
तेनस्ववशमानीताः देवासुरनरोरगाः ।
ससुतं वैष्णवं दिव्यं विष्णुपादसुचिन्तकम् ॥ ३ ॥
हिरण्यकशिपुर्हन्तुं प्रह्लादं प्राञ्जलिं सुतम् ।
कृत्वा चैवाग्निमध्यस्थं पर्वताद् विनिपातितम् ॥ ४ ॥
निबध्य च जयस्तम्भे शुभं वै वज्रशृङ्खलैः ।
तेनाऽसौ स्तूयमानश्च विष्णुः स्तम्भार्दनार्चितः ॥ ५ ॥
विश्वकर्मा बोले - अब मैं पहले संक्षेप में हिरण्यकशिपु के बारे में कहता हूँ।
इस महोत्कट, भयङ्कर असुर के द्वारा अनेकों देव-दानवों का वध हुआ। उसने समस्त
देवता, असुर, मनुष्यों और नागों को अपने वश में कर रखा था। इस दुष्ट ने, विष्णु
भगवान् के चरणों में भक्ति रखने वाले अपने दिव्य वैष्णवपुत्र को भी वश में करने के
लिए अग्नि के मध्य में जलाने, ऊँचे पर्वत शिखरों से गिराने, बड़ी सुदृढ़ साँकलों से
जय खम्भ से बाँधकर तरह-तरह के कष्ट दिए परन्तु प्रह्लाद खम्भे से बन्धे हुए अपनी
अञ्जलियों को भगवान् विष्णु की स्तुति करने में जोड़े हुए प्रार्थना करते रहे।
अथ नरसिंहावतार कालादीनां -
त्रयोदश₁₃ लक्षाब्देषु गतेषु च कृते युगे ।
राधशुक्लचतुर्दश्यां₁₄ ज्येष्ठान्ते च मुहूर्तके ॥ ६ ॥
ऊर्ध्वं सिंहतनुं कृत्वा चाधो नरतनुं तथा ।
स्तम्भं संस्फोट्य तं घोरं सूदयिष्यति दानवम् ॥ ७ ॥

  1. 'वामनावतारो नाम षड्विंशं सूत्रम्' इति प्रकाशित पाठः।

120 अपराजितपृच्छा

जब कृतयुग के तेरह लाख वर्ष व्यतीत हो जाएँगे, तब वैशाख मास शुक्ला
चतुर्दशी (राध¹शुक्ल चतुर्दशी), ज्येष्ठा नक्षत्र के अन्तिम मुहूर्त में (मैं अवतार
लूँगा)। मेरे देह के ऊर्ध्वभाग में सिंह का स्वरूप होगा और नीचे का भाग मानव
स्वरूप में होगा। मैं उक्त विशाल स्तम्भ को फाड़कर विकराल रूप में निकलकर
उस हिरण्यकशिपु को सूदयिष्यति — मारूँगा।
प्रह्लादस्य तथा राज्यं विष्णुर्दास्यति भूतले।
एकच्छत्रां स दत्तां च पालयेद्भूतधारिणीम् ॥ 8 ॥
(हे अपराजित!) भगवान नरसिंह का रूप धारण करने वाले विष्णु इस भूतल का
राज्य प्रह्लाद को देंगे जो समस्त पृथ्वी का एक छत्र राज्य करके धरती का पालन करेंगे।
नरसिंहवर्णनं —
यं दृष्ट्वा नारसिंहं विक्रतनखमुखं तीक्ष्णदंष्ट्राकरालम्
पिङ्गाक्षं स्तब्धकर्णं हुतवहसदृशं कुञ्चिताग्रोऽग्रकेशम्।
भीतास्ते दानवेन्द्रा असुरवरभटाः शस्त्रमुद्गीर्यहस्तात्
हाहा किं किं किमेतत् क्षुभितजनपदः पातु वो नारसिंहः ॥ ९ ॥
जिस नारसिंह रूप को भयानक नख-मुख, तीक्ष्ण और कराल दाँतों, लाल-
लाल आँखों, चकित खड़े कानों, भयानक हुताग्नि जैसा और सिर के अयाल भाग के
भयानक रूप में बिखरे उठे हुए बालों को देखकर वे सभी दानवेन्द्र, असुर वीर
जिनके हाथों में गदा रूपी शस्त्र धारण किए हुए थे, भयभीत होकर हाहाकार करने
लगे और डर से काँपते हुए समस्त जनपद के लोग, यह क्या है? यह क्या है??
पुकारने लगे — ऐसे नरसिंह भगवान हमी रक्षा करें।
यः स्तम्भाद् गर्जमानो गगडगडगडदू बालचन्द्रार्कदंष्ट्रः
व्योमाभुव्याप्यमानः पपटपटपटत् पोट्यमानः शटाभिः।
दंष्ट्राभिः खाद्यमानः ककहकहकहतू स्तूयमानः सुरेन्द्रैः
निष्क्रान्तो हास्ययुक्तः ककहकहकहतू पातु वो नारसिंहः ॥ १० ॥
इति नृसिंहावतारश्चतुर्थः।
जो स्तम्भ फाड़कर उसमें से गर्जन करते हुए गगड-गडगडद शब्द ध्वनि करते


  1. ग्रन्थान्तर में द्वादश माह के नाम पर्यायानुसार इस प्रकार आए हैं— मधु-चैत्र, माधव-वैशाख, ज्येष्ठ-
    शुक्र, शुचि- आषाढ़, नभ-श्रावण, नभस्य-भाद्रपद, इष- आश्विन, ऊर्ज-कार्तिक, सहा- मार्गशीर्ष,
    सहस्य-पौष, तप-माघ, तपस्य-फाल्गुन। ये क्रमानुसार चैत्रादि बारह महीनों के पर्याय हैं— मधुश्च
    माधवः शुक्रः शुचिश्चापि नभाद्वयः ॥ नभस्य इष ऊर्जश्च सहाख्यश्च सहाख्यश्च सहस्यकः । तपस्तपस्यः
    क्रमशश्चैत्रादीनां त संज्ञकाः ॥ (नारदसंहिता ३. ४1-४३)

सूत्र-२६ 121
हुए और उदित होते बालचन्द्र, द्वितीया के चन्द्र की तरह तीखे दाँतों वाले, भूमि से
लेकर व्योम तक विस्तीर्ण पपटपटपटत् फटकारते हुए भरपूर बालों से युक्त, तीक्ष्ण
दाढ़ों से चबाकर खा जाने की तैयारी में दाँतों को कटकटकटकटत् करते हुए भगवान्
नरसिंह है— उनकी सुरेन्द्र आदि ने भी निष्प्रभ होते हुए स्तुति की। इससे भगवान्
नरसिंह की हंसी छूट गई और वे ककहकहकहत् खिलखिलाकर हंस पड़े— ऐसे
नरसिंह भगवान हमारी रक्षा करें।
अथ पञ्चम वामनावतारणवर्णनम् —
सन्धौ च समनुप्राप्ते त्रेतायाश्च कृतस्य च।
अयुक्ताश्च नरा नार्यश्चाल्पशस्या तु मेदिनी ॥ 11 ॥
तीर्थात् पुण्यानि गच्छन्ति लोको दानानि वाञ्छति।
दासन्ति विप्राः शूद्रेषु वैश्याश्च नृपपावनाः ॥ 12 ॥
(अब विष्णु के पाँचवें वामन अवतार का वर्णन किया जा रहा है। यहाँ
प्रथमतः युगवर्णन है) त्रेतायुग एवं सत्युग के सन्धिकाल के आते-आते नर-नारी
के परस्पर सम्बन्ध टूटने लगेंगे और धरती पर कृषि की उपज क्षीण हो जाएगी। ऐसे
समय में तीर्थ क्षेत्रों से पुण्य का लोप हो जाएगा। लोग दान एवं भिक्षा की वाञ्छा से
भट जाएँगे, विप्र लोग शूद्रों के दास होकर उनकी सेवा में तत्पर होंगे जबकि
वैश्यगण भी राजाओं के आदेश बजाने में लगेंगे।
भुञ्जते रौप्यपात्रेषु स्मरार्ता विप्रजातयः ।
नैव साङ्ख्यं नास्ति भाट्टं न दर्शनचतुष्टयम् ॥ 13 ॥
नृपा युद्धानि कुर्वन्ति भूम्यर्थे च परस्परम्।
त्रिपादो वर्तते धर्मः पादश्चैकस्त्वकर्मणि ॥ 14 ॥
(तब) स्वर्णपात्रों में खाने वाले विप्रगणों का इतना पतन हो जाएगा कि उनको
चाँदी के पात्रों में भोजन करना पड़ेगा, वे स्मरार्ता (कामदेव के वशीभूत) हो
जाएँगे। उनमें कथा-पुराण वाचक भट्टगणों के गुण नष्टभूत होंगे और वे
दर्शनचतुष्टय¹ को विस्मृत कर जाएँगे। राजा लोग ऐसे समय में अतिक्रमण करने के

  1. दर्शन चतुष्टय से आशय है— साक्षात्, पत्रिक (पत्राचार-जात), चित्र एवं स्वप्न। इनके प्रतिपाद्य भी
    चार हैं— हेय (त्याज्य), हेयहेतु (दुःखकारण), हान (दुःखनिवृत्ति), हानोपाय (दुःख से निवृत्ति के
    उपाय)। भाट्ट से यहाँ आशय नाट्यवृत्ति के उस तीसरे प्रकार से भी हो सकता है जिसके चार भेद हैं—
    संक्षिति (संक्षिप्त वस्तु रचना), सम्फेट (दो पात्रों के बीच सक्रोध सङ्घर्ष), वस्तूत्थापन (मन्त्रबल और
    मायाजाल से प्रस्तुत दृश्य) एवं अवपात (किसी पात्र के मञ्च पर उपस्थित होने से भगदड़ मचना)।
    (दशरूपक 2, 57-59)

122 अपराजितपृच्छा
प्रयोजन से परस्पर युद्धरत रहेंगे और धर्म का एक चतुर्थांश घट जाएगा जिससे धर्म
केवल तीन चौथाई ही रह जाएगा।
दैत्यवंशोद्भवो राजा बली स्याद् दानगर्वितः।
गर्वहा सम्भविष्यामि विष्णुर्वै बलिवञ्चने ॥ 15 ॥
अदितेः कश्यपसुतः सम्भविष्यामि भूतले।
भाद्रशुक्लद्वादश्यां $_{12}$ वै श्रवणे सुमुहूर्तके ॥ 16 ॥
उक्त सन्धिकाल में दैत्यवंश में उत्पन्न होने वाले राजा बलि दान देने के अपने
गर्व में फूल जाएगा, अभिभूत हो जाएगा और उसके गर्व को चूर करने के लिए
विष्णु के वामन अवतार रूप में बलि राजा को ठगने के लिए अदिति के गर्भ में
कश्यप ऋषि के पुत्र के रूप में इस पृथ्वी पर अवतार लेंगे। यह अवतार भाद्रपद के
शुक्ल पक्ष की द्वादशी को हस्त नक्षत्र में शुभ मुहूर्त में होगा।¹
अदितेश्च समुत्पन्नो लघुकायो दृढात्मकः।
तत्रोद्भविष्यदेवं च विष्णुर्वै वामनाकृतिः ॥ 17 ॥
ततो वामनरूपेण स्तूयमानो द्विजोत्तमैः।
स्वागतः सिंहद्वाराग्रे बलिर्यत्र धरापतिः ॥ 18 ॥
समुच्चार्य वेदशास्त्रं द्विजसहस्रध्वनिर्यथा।
बलिस्तुष्टोऽथ विप्रेन्द्र ददामि यत्तवेप्सितम् ॥ 19 ॥
(विष्णु की यह प्रतिज्ञा है कि) 'मैं अदिति के गर्भ से लघुकाय— वामन रूप
में तथा दृढात्मक अर्थात् दृढ़ आत्मबल वाला विष्णु वामनाकृति में इस प्रकार उत्पन्न
होऊँगा। तब मैं वामन रूप में बड़े-बड़े उत्तम द्विजों के द्वारा बलिराजा के राज्यद्वार,
सिंहद्वार के आगे पूजित होकर स्वागत पाऊँगा। वहाँ मैं मानो हजारों द्विजों की ध्वनि
हो रही हो, ऐसी वेदशास्त्रों की ध्वनि का उच्चारण करूँगा जिससे बलि मुझसे
सन्तुष्ट हो जाएगा और मुझे विप्रेन्द्र मानकर जो कुछ मैं चाहूँगा, (वह मुझे कहेगा
कि) आप जो चाहते हैं, वह मैं प्रदान करता हूँ।'
विष्णुरुवाच —
ममपादत्रयं भूमेर्याचनीयं नृपोत्तम।
नैवाऽकाङ्क्षे च राजेन्द्र महादानानि भोगिनाम् ॥ 20 ॥

  1. भागवत में भी आया है— श्रोणायां श्रवणद्वादश्यां मुहूर्तेऽभिजिति प्रभुः। सर्वे नक्षत्रताराद्याश्चक्रुस्तज्जन्म
    दक्षिणम्॥ द्वादश्यां सवितातिष्ठन्मन्दिनगतो नृप। विजया नाम सा प्रोक्ता यस्यां जन्म विदुर्हरैः ॥ (भागवत
    8, 18, 5-6)

सूत्र-२७ 123
हस्तोदकं मया दत्तं यावच्चन्द्रार्कतारकम्।
तं दिव्यरूपमास्थाय क्रमिष्यामि वसुन्धराम् ॥ २१ ॥
विष्णु ने (अवतार के समय राजा से कहा था) 'हे नृपोत्तम! मुझे तो केवल
तीन पाँवों जितनी ही भूमि याचनीय है। हे राजेन्द्र! मैं तो अन्य भोगवादियों की
भाँति बड़े-बड़े दानों की तनिक भी आकांक्षा नहीं रखता हूँ।¹ इसलिए राजा बलि
यह सङ्कल्प करेगा कि 'जब तक चन्द्रमा व सूर्य सहित तारागणों की स्थिति रहेगी,
तब तक के लिए मेरे द्वारा यह दान दिया जा रहा है।' ऐसे में मैं दिव्यरूप होकर
समस्त वसुन्धरा को नाप लूँगा।'
बलिं चैव करिष्यामि पातालतलवासिनम्।
देवांश्चैव करिष्यामि स्वस्वस्थानेषु शाश्वतम् ॥ २२ ॥
'इसी बीच, भूमि का नाप पूर्ण नहीं होने पर बलि पर अधिकार कर उसे
पातालवासी बना दूँगा और देवताओं को उसके पंजे से छुड़ाकर उनके अपने-अपने
स्थानों पर शाश्वत रूप में स्थापित कर दूँगा।'
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
वामनावतारनिर्णयाधिकारो नाम षड्विंशं सूत्रम् ॥ २६ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में
वामनावतार निर्णय अधिकार नामक छब्बीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥
रामावतारो नाम सप्तविंशं सूत्रम् ॥ २७ ॥
विश्वकर्मोवाच —
त्रेताद्धे चाब्द आद्ये च ह्याषाढे कृष्णषष्ठिका।
नाम प्रोक्तं पुण्डरीकं धनिष्ठान्ते मुहूर्त्तके ॥ १ ॥
जमदग्निसुतो भूत्वा रामः शस्त्रभृतां वरः।
क्षत्रियांश्च वधिष्याभि पृथ्‍वी निःक्षत्रयी कृता ॥ २ ॥
विश्वकर्मा ने आगे कहा— त्रेतायुग के आधे व्यतीत हो जाने पर आने वाले
अद्यवर्ष की आषाढ़ माह की कृष्ण पक्ष की षष्ठितिथि को पुण्डरीक नामक धनिष्ठा
नक्षत्र के अन्तिम मुहूर्त में शस्त्रधारियों में परमश्रेष्ठ, महर्षि जमदग्नि के पुत्र

  1. वामनपुराण में आया है— गजाश्वभूमिहिरण्यादि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम्। एतावता त्वहं चार्था देहि राजन्
    पदत्रयम् ॥ अर्थात् हे राजन्, हाथी, घोड़े, भूमि, सुवर्ण आदि उन-उन वस्तुओं के याचकों को दीजिए, मैं
    तो इतने की ही याचना करता हूँ कि मुझे तीन पग भूमि प्रदान कीजिए। (वामन. 91, 16)

124 अपराजितपृच्छा
(परशु)राम हुए जिन्होंने क्षत्रियों का वध करके इस पृथ्वी को निःक्षत्रयी अर्थात्
क्षत्रियों वे विहीन कर दिया।
परशुराममाहात्म्यमाह -
एकविंशतिवारांश्च${21}$ समुद्रान्ता च मेदिनी।
तेन दत्ता द्विजवरे कश्यपे च त्वकण्टका ॥ ३ ॥
विप्रयुक्ताश्च राजेन्द्र उत्पन्ना च वसुन्धरा।
समुद्रः शाम्यते येन आसिद् द्वादश$
{12}$ योजनैः ॥ ४ ॥
उन्होंने समुद्रान्त समस्त पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्यकर निष्कण्टक
भूमि द्विजवर कश्यप ऋषि को दान कर दी। तब से इस वसुन्धरा पर विप्रों से युक्त
कराकर अर्थात् विप्रों से नियोग द्वारा नवीन राजेन्द्र उत्पन्न किए जिनसे बारह योजन
तक की दूरी तक समुद्रों का शमन किया अर्थात् शासन किया।
प्रवृत्तांश्चैव देशांश्च कोङ्कणांश्च चतुर्दिशम्।
क्षत्रमुत्सादियिष्यामि सभृत्यबलवाहनम् ॥ ५ ॥
उन्होंने कोङ्कण सहित कई देशों के चारों ओर से आगे बढ़कर क्षत्रियों का
उनके नौकरों, सेना व वाहन सहित उत्साद अर्थात् सर्वविनाश कर दिया।
जमदग्निसुतो रामः पुनर्जन्म करिष्यति।
तेनाहं प्रहरिष्याभ्ययोध्यायां सप्तमो हरिः ॥ ६ ॥
षष्ठं परशुरामं च हरिर्हन्ति च सप्तमः।
सन्धौ च समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च ॥ ७ ॥
इति परशुरामावतार षष्ठः।
उक्त जमदग्निसुत (परशु)राम पुनः जन्म लेगा। (भविष्य में) उसको मैं सातवें
विष्णु अवतार में राम के रूप में जन्म लेकर आहत करूँगा। इस प्रकार छठवें परशुराम
का सातवें हरि (श्रीराम) त्रेता एवं द्वापर युग की सन्धि आने पर हनन करेंगे।
अथ दाशरथीरामचरित्रं -
रामोदाशरथिर्भूत्वा कौशल्यानन्दवर्धनः।
विश्वामित्रयज्ञधुर्यस्ताडकां राक्षसीं हत्वा
जमदग्निसुतं जित्वा धनुर्भङ्गे सीतापत्तिः ॥ ८ ॥
(अब सातवें विष्णु के अवतार श्रीराम के चरित्र का वर्णन है) कौशल्या के
आनन्द को बढ़ाने वाले राम दाशरथी होकर तथा विश्वामित्र के यज्ञ की धुरी बनकर

सूत्र-२७ 125
ताड़का राक्षसी को मारकर और जामदग्न्य राम को जीत कर धनुर्भङ्ग करके सीता
के पति होंगे।
वनवासं करिष्यामि सीतालक्ष्मणसंयुतः।
चित्रकूटे तथा सीता पर्ययुक्ता च लक्ष्मणैः॥ 9 ॥¹
रामगिर्याश्रमे प्राप्ते तत्र वै दण्डकावने।
लङ्केशेन हृता सीता कपटैर्मृगरूपतः॥ 10 ॥
बाद में सीता और लक्ष्मण के साथ वनवासी होंगे और चित्रकूट से सीता,
लक्ष्मण के साथ दण्डकवन में जाकर रामगिरि आश्रम बनाकर रहेंगे। वहाँ कपटमृग
का रूप बनाकर मारीच के छल से लङ्केश रावण ने सीता का अपहरण किया।
हतो मृगश्च सीतार्थे त्रिशिराः खरदूषणा॥
वेषमाना शूर्पणखा धृतासु राक्षसी कृता॥ 11 ॥
सुग्रीवस्य समक्षं च हतो वाली महाबलः।
तैश्चापि वानरैः सार्ध करिष्यामि यथा सुखम्॥ 12 ॥
दशयोजन ¹⁰विस्तीर्णमायतं शतयोजनैः।
सेतुबन्धनमावृत्तं जले शैलसमाकुलम्॥ 13 ॥
राम ने सीता के लिए मायामृग को मार गिराया और शूर्पणखा राक्षसी जब
अपमानित होकर त्रिशिरा खर और दूषण से लड़ने के लिए अपने साथ घर लाई तो
राम ने खर-दूषण को भी मार दिया। बाद में राम ने सुग्रीव के समक्ष बाली जैसे
महाबली को मार गिराया। इसके बाद, वानरों के साथ मिलकर आसानी से दस
योजन चौड़ा और सौ योजन लम्बा शिखाखण्डों से निर्मित सेतु बाँधकर समुद्र के
जल को आवृत्त किया।
हत्वा तु रावणं घोरं सभृत्यं देशकण्टकम्।
विभीषणाय दास्यामि राज्य निहतकण्टकम्॥ 14 ॥
सीताशुद्धिं समानीय पुष्पवृष्टिः सुरैः कृता।
दत्ते विभीषणे राज्ये प्रत्यागच्छत् स्वकां पुरीम्॥ 15 ॥
इसके बाद, लङ्का पर चढ़ाई की और महादुष्ट रावण रूपी देशकण्टक को
उसके समस्त सहायक अधिकारी, भृत्यों सहित मारकर विभीषण को निष्कण्टक
राज्य प्रदान किया। इसके बाद सीता की मुक्ति मानकर देवताओं ने पुष्पवृष्टि की

  1. 'चित्रकूटे तथा सीता पर्ययुक्ता न लक्ष्मणैः ?' प्रकाशित पाठः। विशेष वाल्मीकि रामायण (२,५.६,२२-३१)

126 अपराजितपृच्छा
और राम विभीषण को राज्य देकर सीता के साथ अपनी स्वयं की अयोध्यापुरी की
ओर अग्रसर हुए।
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च।
धर्मेण पालयेद राज्यं समुद्रान्ता च मेदिनीम् ॥ 16 ॥
इति रामावतारसप्तमम्।
अयोध्या में राजतिलक होने के बाद राम ने ग्यारह हजार वर्षों तक इस धरती
पर आसमुद्र चक्रवर्ती राज्य किया और धर्मपूर्वक प्रजा का पालन किया।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
रामावतारनिर्णयाधिकारो नाम सप्तविंशं सूत्रम् ॥ 27 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में रामावतार
निर्णय अधिकार नामक सत्ताईसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 27 ॥
हरेष्टमः कृष्णावतारो नामाष्टाविंशं सूत्रम् ॥ 28 ॥
विश्वकर्मोवाच —
पुनर्जन्म करिष्यामि धर्मार्थे त्वपराजित।
मथुरायां चापरं तु द्वापरानते कलौ युगे ॥ 1 ॥
जातोऽवतारो विष्णोश्च दानवानां वधार्थकः।
कृष्णपक्षे भाद्रपदे ह्यष्टम्यां च तिथौ तथा ॥ 2 ॥
रोहिणी नाम नक्षत्रे ह्यर्धरात्रे तथागते।
वसुदेवसुतः श्रीमान् वासुदेव इति श्रुतः ॥ 3 ॥
विश्वकर्मा बोले — (भगवान विष्णु की प्रतिज्ञा है कि) धर्म के लिए मैं द्वापर
युग के अन्त में कलियुग के आरम्भ में, मथुरा नगर में पुनर्जन्म लूँगा। दानवों के
वध के लिए विष्णु के अवतार के रूप में जन्म ग्रहण करूँगा। भाद्रपद माह के
कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र में आधी रात्रि बीत जाने पर वसुदेव के
पुत्र श्रीमान् वासुदेव के नाम से ख्यात होऊँगा।
अवतारप्रयोजनोपरान्तकृष्णलीलावर्णनं —
तस्य कर्माणि चाख्यास्ये शृणु चैकाग्रमानसः।
पूतनां घातयिष्यामि दुष्टां वै बालघातकीम् ॥ 4 ॥
गोकुले च गतो देवो वर्तमानं महाधनम्।
गवार्थे चाद्धरिष्येऽहं गिरि गोवर्द्धनं तथा ॥ 5 ॥

सूत्र-२८ 127
प्रवृत्तायां महावृष्टौ गिरिपृष्ठनिवासिनाम्।
कालीयकं वशीकृत्य यमुनायां महार्णवे ॥ ६ ॥
अब मैं उस अवतार में किए गए कार्यों के विषय में कहता हूँ, जिसे तुम
एकाग्रचित्त होकर सुनो। सबसे पहले मैं बालघातिनी दुष्टा पूतना को मारूँगा और
गोकुल में पूजनीय देवस्वरूप में जाकर वर्तमान युग के महाधन गौओं के लिए
गोवर्द्धनगिरि का उद्धार करूँगा। साथ ही उस गोवर्द्धनगिरि पर रहने वालों की
महावृष्टि से रक्षा करूँगा। यमुना नदी के महासागर रूपी हृद में निवास करने वाले
कालीयक नाग को वश में करूँगा।
समानीष्टा ? ( हा )नि पद्मानि कंसस्यार्थे तु विग्रहे।
मल्लयुद्धं करिष्यामि सह तैस्तु महोत्कटम् ॥ ७ ॥
मथुरायां वधिष्यामि कंसं च केशिनं तथा।
चाणूरं च तथा बाहुं मुष्टिकं च महाबलम् ॥ ८ ॥
प्रलम्बं धेनुकं चैव हारिष्टं वृषरूपिणम्।
कालनेमिं हनिष्यामि त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ९ ॥
कंस के साथ विग्रह करने जाते समय मैं उसके लिए हानिकारक कमल के पुष्प
लाऊँगा और कंस के महोत्कट, भीषण युद्ध करने वाले पहलवानों के साथ मल्लयुद्ध
करूँगा। मथुरा नगरी में जाकर मैं कंस, केशी, चाणूर तथा महाबलवान् बाहु व मुष्टिक
को मारूँगा। इसी प्रकार प्रलम्बासुर, धेनुकासुर, अरिष्टासुर जो कि बैल के रूप में
रहता है और कालनेमि जो तीनों लोकों में विख्यात है, को भी मारूँगा।
कुशस्थलीं गमिष्यामि तीर्थे चावन्तिकाश्रिते।
नरकं च वधिष्यामि कुण्डलार्थे महासुरम् ॥ १० ॥
शोणिताख्यां पुरीं गत्वा करिष्ये कदनं महत्।
भुजच्छेदं करिष्यामि बाणस्य रणमूर्धनि ॥ ११ ॥
शङ्करं योधयिष्यामि बाणस्यार्थे परं तप।
शोणिताख्यां पुरीं गत्वा जरासन्धेन विग्रहः ॥ १२ ॥
इसके बाद मैं आवन्तिकापुरी के आश्रित कुशस्थली तीर्थ¹ को जाऊँगा। बाद
में, कुण्डलों के लिए महानरकासुर का वध करूँगा। इसी प्रकार शोणितपुर नामक

  1. कुशस्थली उज्जैन का भी पूर्वनाम है। स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में इसके नामकरण व माहात्म्य का
    वर्णन मिलता है। ब्रह्मा ने यहाँ कुश की मुष्टि हाथों में लेकर स्थिर व अवस्थित जगत की सृष्टि का
    सङ्कल्प किया था। विष्णु ने इसको ब्रह्मा को प्रदान किया था। विष्णु स्वयं यहां कुशासन पर विराजित

128 अपराजितपृच्छा
बाणासुर की नगरी में जाकर भीषण रण-संग्राम मचाऊँगा और बाणासुर की
भुजाओं को रणाङ्गन में काट गिराऊँगा। इस भयङ्कर युद्ध में परम तपस्वी शङ्कर भी
अपने भक्त बाणासुर की सहायतार्थ आएँगे जिनके साथ मैं युद्ध करूँगा। शोणितपुर
जाने के बाद जरासन्ध से विग्रह करूँगा।
जरासन्धो हतो भ्रात्रा शोणितस्थे जनार्दने।
जरासन्धभयत्रस्तान् रक्षिष्यति च पार्थिवान् ॥ 13 ॥
जरासन्धसुतं बाला वृद्धा पृष्टाश्च यादवाः।
नव₉ कोटयः सङ्ख्यया दन्तिनां लक्षविंशतिः₂₀ ॥ 14 ॥
रथानां सार्धकोटिश्च तदर्ध च पदातयः।
कोटयोऽष्टादश₁₈ तथाऽग्रे निगच्छन्ति यादवाः ॥ 15 ॥
वहाँ मैं जरासन्ध का वध करूँगा। (विश्वकर्मा ने आगे कहा कि) इसी तरह
शोणितपुरी में रहने वाले बाणासुर के भाई जरासन्ध को मारकर जनार्दन विष्णु
अवतार जरासन्ध से भयत्रस्त समस्त राजाओं की रक्षा करेंगे। जरासन्ध के पुत्र के
बालक, वृद्ध, अनुयायी यादवों की संख्या नौ करोड़ थी जिनके पास बीस लाख
हाथी थे और डेढ़ करोड़ रथ थे और इनकी आधी संख्या में पदाती (पैदल युद्ध
करने वाले) सैनिक थे। इसी प्रकार अठारह करोड़ यादव (योद्धा) उसके आगे
चलते थे।
कृष्णकुलमध्ये भवा मध्यतलान्तरस्थिताः।
तेभ्यो कपटचिताज्वालाय देवो( वां )भिधानको विदुः ? ॥ 16 ॥
प्रविष्टस्तत्र वै काले प्रतिज्ञातो महारथी।

हुए जिससे इसका नाम कुशस्थली हुआ। पूर्वकाल में इसका नाम हेमशृङ्गा था— कुशस्थलीं संस्थित
एवं देव इत्थं विधात्रा पुरुषोत्तमः स्तुतः। स्थलीं कुशैरास्तारितामुपाविशत्कुशस्थलीं देवमुनीन्द्र सेविताम् ॥
समन्ततो योजनसङ्ख्ययावृत्तां ततो विधाता पुरुषोत्तमस्तथा। कुशस्थलीति प्रथितं जगत्त्रये प्रचक्रतुर्नाम च
तावुभावपि ॥ तत्र विश्वपतिः श्रीमान् विश्वेशो विश्वकृद्विभुः। विश्वं शशास विश्वात्मा सर्वविश्वस्य नायकः ॥
एवं कुशस्थली ख्याता हेमशृङ्गेति या पुरा। स्तीर्णा कुशैर्यतो धात्रा कुशस्थली ततः स्मृता ॥ (स्कन्द.
अवन्तिक्षेत्र माहात्म्य, 41, 29-32)
इसके विपरीत हरिवंश में यह वर्णन है कि गरुड़ द्वारा पश्चिम दिशा में कुशस्थली को देखा गया जो रैवत
की स्थली थी और वहाँ रमणीय रैवतगिरि और मनोहर वन थे। यह पर्वत व समुद्रतट का आशय लेकर
अवस्थित थी— देव यास्यामि नगरीं रैवतस्य कुशस्थलीम्। रैवतं च गिरि रम्यं नन्दनप्रतिमं वनम्।
रुक्मिणोद्वासितां रम्यां शैलोदधितटाश्रयाम्। (हरिवंश, विष्णुपर्व 55, 7-8) स्कन्दपुराण से पता चलता है
कि कुशस्थली का राजा रैवत मूलतः तक्षकनाग था किन्तु वह ब्राह्मणों के श्राप से प्रभास में राज करता
था। (स्कन्द. नागर, अध्याय 116)

सूत्र-२८ १२९
इसी बीच कृष्णकुल (ब्रज में) अन्तराल हुआ। यादवजनों में विछोह शुरू
हुआ। वहाँ कपट की चिता की ज्वाला प्रज्वलित हुई जिसको विद्वानों ने दैव
(दैवक्लेश) नाम से कहा है।¹ उस क्षेत्र में काल का प्रतिज्ञान रखने वाला
(कालयवन) महारथी चढ़ आया (?)।
शेषाश्च विनिवर्तन्ते जरासन्धभयार्दिताः ॥ 17 ॥
ये देवगिरिमाश्चित्य सौराष्ट्रदेशवासिनः ।
वारुण्यां च दिशायां च प्रभासक्षेत्रमागताः ॥ 18 ॥
(वहाँ से) शेष सभी जन जरासन्ध के भय से दुखी होकर लौट गए जो देवगिरि
होते हुए सौराष्ट्र के निवासी हुए और पश्चिम दिशा में प्रभास क्षेत्र तक पहुँचे।²
समुद्राभ्यर्थनं कृत्वा कृष्णो वा बलदेवकः ।
सद्यो (द्रो ?) गेन्द्र भूमिसैना स्थितावुभौ दन्तकाष्ठादिभिः ॥ 19 ॥
वरुणेषु यत्र द्वारं चतुर्विंशति²⁴ योजनैः ।
वहाँ श्रीकृष्ण और बलदेव ने समुद्र की पूजा की। दोनों ने अपनी पैदल सेना व
गजों को ध्यान पूर्वक देखा अर्थात् सेना का निरीक्षण किया। वरुण या पश्चिम दिशा
में जहाँ द्वार (समुद्र के बाद देश का द्वार होने से द्वारका की पहचान, समुद्र-द्वार)
था, भूमि चौबीस योजन विस्तार था।
शक्रेण प्रेषितास्तत्र निधयो धनदेव च ॥ 20 ॥
तेभ्यः समुद्भवा सृष्टिः काञ्चनै रत्नसञ्चितैः ।
दिनानां त्वेकविंशत्या²¹ ³सम्भवाः कुलयादवाः ॥ 21 ॥

  1. हरिवंश में यवनाधिपति के लिए 'दैवादपुत्रः' शब्द का प्रयोग हुआ है जो देवयोग से पुत्र विहीन था
    और पुत्र की कामना रखता था। (हरिवंश विष्णुपर्व 57, 12) महारथी कालयवन गोपाली नामक
    अप्सरा से तपस्वी गार्ग्यमुनि के द्वारा नियोग से उत्पन्न हुआ— मानुष्यां गार्ग्यभार्यायां
    नियोगाच्छूलपाणिना । स कालयवनो नाम जज्ञे शूरो महाबलः ॥ (तत्रैव 57, 15) कृष्ण ने मथुरा में वैर
    का अन्त कर डालने की इच्छा से द्वारकापुरी बसाकर वृष्णिवंशियों को आश्वासन दिया था— वैरस्यान्तं
    विधित्संस्तु वासुदेवो महायशाः । निवेश्य द्वारकां राजन् वृष्णीनाभास्य चैव ह ॥ (तत्रैव 57, 39)
  2. हरिवंश आदि में लोगों के उत्तर क्षेत्र से पलायन कर पश्चिम दिशावर्ती क्षेत्रों में जाकर बसने का वर्णन
    मिलता है। 'अन्तर्गिरिद्रोणी' सङ्केत पर विद्वानों ने विचार करते हुए कहा है कि लोग देश की सीमाओं पर
    स्थित पहाड़ी प्रदेशों की घाटियों की ओर पलायन करेंगे। लोग वनाञ्चलों, राजस्थान की लूणी नदी के
    तटवर्ती क्षेत्रों और हिमालय के पार्श्व में जाकर म्लेच्छों के साथ बस जाएँगे—कृत्स्नं वा हिमवत्पार्श्वे कूलं च
    लवणाम्भसः । अरण्येषु च वत्स्यन्ति नराः म्लेच्छगणैः सह ॥ (हरिवंशपुराण भविष्यपर्व 3, 4, 32)
  3. 'सम्बद्धाः कुलयादवाः ?' इति प्रकाशित पाठः । विशेष— महाभारत के खिल हरिवंश, ब्रह्मवैवर्तपुराण में
    द्वारकापुरी की रचना का विशेष वर्णन मिलता है।

130 अपराजितपृच्छा
तत्राष्टादशकोटीनां निवासाश्च महोत्सवाः।
वहाँ देवराज इन्द्र ने सहायता की और कुबेर ने निधियाँ अर्पित कीं। वहाँ भी
सृष्टि से पूर्व सञ्चित रत्न और स्वर्ण सभी यादव कुलों के सामूहिक प्रयास से इक्कीस
दिनों में बाहर निकला। इसी के बल पर वहाँ अठारह करोड़ निवास गृह बनाए गए
और महोत्सव रखा गया।
अथ द्वारकापुरीवर्णनं —
सा पुरी च महारम्या हेमप्राकारसम्भवा ॥ 22 ॥
पुर-प्राकार-परिखा-प्रतोली-मार्ग-गोपुरम्।
प्रासाद-प्रतिमा-सद्ममाडोत्तुङ्गमहोत्सवम् ॥ 23 ॥
उस द्वारकापुरी की बसावट बहुत रमणीक थी जिसमें स्वर्ण से निर्मित परकोटे
थे। उसकी रचना में पुर, प्राकार, परिक्खा (खाई), प्रतोली (लघु द्वार), महापथ,
गोपुर, प्रासाद और उनमें प्रतिमाएँ, भवन, माड बहुत उन्नत थे जिनमें महोत्सव का
माहौल था।
हिन्दोलकैस्तोरणैश्च रत्नैश्चैव विभूषिता।
रत्नोद्योतकुलाकीर्णा हेमरौप्यादितो भवा ॥ 24 ॥
स्फटिकैर्दिव्यसोपानैस्तडागैर्विविधैस्तथा।
पुष्परागेन्द्रनीलाढ्यपदकैः सूर्यरश्मिभिः ॥ 25 ॥
द्वारका नगरी को हिन्दोलों, तोरणों और नाना रत्नों से सजाया गया था जिससे
असंख्य रत्नों के पुञ्ज की और सोने-चाँदी के उपकरणों की चारों ओर चमक-ही-
चमक प्रसारित हो गई थी। द्वारका नगरी के तरह-तरह के जलाशयों के सोपान,
स्फटिक से निर्मित बड़े दिव्य बने हुए थे जिन पर सूर्य की किरणों से पुष्पराग
(पुखराज), इन्द्रनीलमणि (नीलम) आदि की शोभायुक्त छवि देखते ही बनती थी।
श्वेतरक्तहरित्पीतैः प्राकारैरिन्द्रकोपमैः।
अनेकोद्यानवाटीभिर्दिव्यवृक्षलतागृहैः ॥ 26 ॥
एकोद्येकविंशत्यन्तभूम्युद्भवगृहाणि च।
मालमौलिशुद्धशृङ्गहर्म्याणि च तथैव च ॥ 27 ॥
श्वेत, रक्त, पीत, हरित रङ्ग के परकोटे इन्द्रधनुष की छटा बिखरते थे।
द्वारकापुरी में अनेकों उद्यान, वाटिकाएँ थीं जिनमें दिव्य वृक्ष और नाना कुञ्ज बने
हुए थे। द्वारकापुरी के भवन एक तल से लेकर इक्कीस तल तक के थे। इनमें माल-
मौली (पङ्क्तियों की कतारों) से शुद्ध कँगूरों वाली बड़ी-बड़ी हवेलियाँ थीं।

सूत्र-२८ 131
राजालयस्य मध्ये च सद्मानि विष्णुतेजसा ? ।
तानि द्व्यष्टसहस्राणि माणिक्यादियुतानि च ॥ २८ ॥
मण्डपैः सुवितानैश्च चन्द्रार्कद्युतिसन्निभैः ।
वसन्तोत्सवसम्प्राप्तौ गोपीक्रीडार्थमेव च ॥ २९ ॥
इसी प्रकार वहाँ राजालय थे जिनके बीच-बीच विष्णु के तेज के समान
प्रकाशित होने वाले कक्षालय थे। इनमें सोलह हजार माणिक्यादि रत्नों से विजड़ित
मण्डप बने हुए थे जिनके चन्दोवे, वितानों की शोभा सूर्य और चन्द्रमा की चमक
के समान प्रतीति देती थी और जो वसन्तोत्सव आने पर गोपीजन के साथ क्रीड़ा
अर्थात् रासलीला के निमित्त बनाए गए थे।
तथा त्रिवलिकैस्तालैस्तथा च पटहोत्तमैः ।
स्वरैश्च मधुरैर्वंश्या हुडकैश्च सलीलया ॥ ३० ॥
विष्णोर्महोत्सवश्चैवं द्वारकापुरमण्डनः ।
वर्णितो देवदैत्याद्यैर्विष्णुराजमहोत्सवः ॥ ३१ ॥
वहाँ लीलाओं के बीच-बीच त्रिवलिका¹ की तालों पर और बड़े-बड़े नगारों
का स्वर वंशी का मधुर निनाद और हुडक्का का वादन होता। उक्त विष्णु महोत्सव
से द्वारकापुर की शोभा बढ़ती है। विष्णुराज महोत्सव का ऐसा वर्णन देवताओं व
दानवों ने किया है।
ध्यष्टयोजनविस्तारा ह्यायता त्र्यष्टयोनैः ।
समुद्रेण त तद्द्वारमुत्तमा द्वारिकाभिधा ॥ ३२ ॥
सर्वश्रेष्ठा पूरीणां च द्वारिका विष्णुभक्तिदा।
वह सोलह योजन विस्तार और चौबीस योजन लम्बाई वाली जो द्वारका नामक
की नगरी² है, वह वास्तव में समुद्र यात्रा करने वालों के लिए उत्तम समुद्र द्वार ही
है। भगवान् विष्णु की भक्ति देने वाली जितनी भी सर्वश्रेष्ठ पुरियाँ हैं, उनमें
द्वारकापुरी भी एक हैं।
तत्र बलादीनां वर्णनं —
चत्वारिंशत्सहस्राणि दन्तिनश्च महोत्कटाः ॥ ३३ ॥

  1. कृदिकारादिति पक्षे ङीपि त्रिवलीत्यपि। (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 2, पृष्ठ 662)
  2. वराहपुराण में इसको पाँच योजन विस्तृत एवं दस योजन लम्बी बताई गई है, इसको इन्द्रपुरी के समान
    व विश्वकर्मा द्वारा निर्मित कहा गया है—अस्ति द्वारवती नाम पुरी शक्रपुरी यथा। मत्प्रभावानुरूपा च
    निर्मिता विश्वकर्मणा॥ पञ्चयोजनविस्तारा दशयोजनमायता। (वराह. 147, 7-8)

चतुर्लक्षाणि सङ्ख्ययाता अश्वास्तेजस्विनस्तथा।
रथाः सपादकोट्यश्च चोष्ट्राः सार्धत्रिकोटिकाः ॥ 34 ॥
तथाष्टादशकोट्यश्च यादवाश्च महाबलाः।
सुभटाश्च महावीरा असङ्ख्ययाताः पदातयः ॥ 35 ॥
इस द्वारकापुरी में चालीस हजार महोत्कट अर्थात् महाबलवान दुर्दभ हाथी हैं
और चार लाख की संख्या में बड़े तेजस्वी अश्व भी हैं। इसके अतिरिक्त सवा करोड़
रथ और साढ़े तीन करोड़ ऊँट हैं। इस नगरी के निवासी यादवगण महाबलवान हैं
जिनकी संख्या अठारह करोड़ हैं, ये सब के सब वीर योद्धा हैं और उनके साथ
असंख्य पैदल सैनिक भी हैं।
द्वारिका या पुरी ख्याता पूज्या सुरनरोरगैः।
सिद्धचारणसङ्गीता ह्याप्सरोगणसेविता ॥ 36 ॥
विद्याधरैश्च गन्धर्वैर्नागेन्द्रैश्चोपसेविता।
तपोधनैश्च दिव्यैश्च ऋषिवृन्दैः समावृता ॥ 37 ॥
माया च मथुरा चैवायोध्या वाराणसी तथा।
काञ्ची जयन्ती द्वारका ह्येता मुक्तिप्रदायिका ॥ 38 ॥
सुर, नर और उरग-नागों के द्वारा पूजित यह द्वारकापुरी बहुत प्रसिद्ध है। सिद्ध,
चारणों द्वारा इसकी महिमा गायी गई है तथा अप्सरा व गणों के द्वारा यह सेवित है।
विद्याधरों, गन्धर्वों, नागराजाओं आदि से यह उपसेवित है और यहाँ तपोधनी, दिव्य
ऋषिगणों के समूहों की बहुतायत है। इसीलिए मुक्तिप्रदायिका नगरियों¹ में द्वारका
भी माया, मथुरा, अयोध्या, वाराणसी, काञ्चीपुर, जयन्ती (अमरावती) इन सात
पुरियों के साथ स्मरण योग्य है।
जरासन्धं वधिष्यामि हेतुमात्रेण भीमतः।
शिशुपालं वधिष्यामि यज्ञे धर्मसुतस्य वै ॥ 39 ॥
ततः पश्चात्करिष्यामि साहाय्यमर्जुनस्य च।
विष्णोर्वाक्यसहायेन हनिष्यामि कुरून् रणे ॥ 40 ॥
(कृष्ण पुनः स्मरण कराते हैं कि) मैं भीम के बहाने से जरासन्ध को मारूँगा
और शिशुपाल को धर्मराज युधिष्ठिर के यज्ञ के बहाने मारूँगा। इसके बाद, मैं अर्जुन
का सहायक बनकर भगवान् विष्णु के वचनों के सहाय (श्रीमद्भगवद्गीता के

  1. अन्यत्र 1. अयोध्या, 2. मथुरा, 3. माया, 4. वाराणसी, 5. काञ्ची, 6. अवन्ती और 7. द्वारका-
    सप्तपुरियों का यह क्रम मिलता है।

सूत्र-२८ 133
वचनानुसार) से अर्जुन को तैयार कर कौरवों का रणाङ्गन में संहार करूँगा।
शस्त्रहस्ता मृता ये ऽत्र स्वर्गं यास्यन्ति क्षत्रियाः।
कलौ च समनुप्राप्ते चतुर्थे युगपर्यये ॥ ४१ ॥
नेमिनाथाभिधानस्तु समुद्रविजयात्मजः।
गिरिमस्तकसम्भूतो द्वाविंशश्च₂₂ तीर्थङ्करः ॥ ४२ ॥
(उक्त महाभारत के रण में) जो क्षत्रिय हाथ में शस्त्र लिए हुए मरेंगे, वे सीधे
स्वर्ग में जाएँगे। यह सब घटना कलियुग, चतुर्थ युग आते-आते ही हो जाएगी।
इसके उपरान्त मैं समुद्रविजय राजा के पुत्र के रूप में नेमिनाथ नाम धारण करके
गिरिनार पर्वत के मस्तक पर बाईसवाँ तीर्थङ्कर बनकर उत्पन्न होऊँगा।
पाण्डवांश्च करिष्यामि केदारे तु हिमाश्रयान्।
गमयिष्यति स्वर्गे तान् केदारः प्रकटीकृतः ॥ ४३ ॥
मैं पाण्डवों को हिमालय के आश्रय में भेजकर उन्हें केदार की ओर जाने को
कहूँगा और वहाँ से जब वे स्वर्ग को जाएँगे, तो केदार तीर्थ को प्रकट करूँगा।
अथ केदारमाहात्म्य —
पृथिव्यां यानि तीर्थानि यानि तिष्ठन्ति भूतले।
केदारं प्रति गत्वा च तदनुग्रहदायकम् ॥ ४४ ॥
भारते च महापुण्यं न तीर्थं केदारात्परम्।
यदिच्छन्ति नरा मोक्षमाश्रयन्तु हिमाचलम् ॥ ४५ ॥
पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं और भूतल पर जितने भी तीर्थ हैं, उन सबमें से
जो भी केदार तीर्थ की ओर जाएगा, उस पर केदार का अनुग्रह दान सदा ही बरसता
रहेगा। समस्त भारत में केदारसे अधिक पुण्यवान् कोई तीर्थ नहीं है। जो भी व्यक्ति
मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखता हो, उसे हिमाचल का आश्रय लेकर केदार तीर्थ में
अवश्य आना चाहिए।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां हरेरष्टमः
कृष्णावतारनिर्णयाधिकारो नामाष्टाविंशं सूत्रम् ॥ २८ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में हरि का
आठवाँ कृष्णावतार निर्णय अधिकार नामक अठाईसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥