अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 491, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिहस्ता कर्षकाणां च प्रकृतेर्द्वयेकहस्तिका ॥ 16 ॥
विप्रों के लिए वेदी सात गज के प्रमाण वाली, क्षत्रियों के लिए छह गज,
वैश्यों के लिए पाँच गज, शूद्रों के लिए चार गज और कृषकों के लिए तीन गज की
हो किन्तु सामान्य जनों के लिए वेदी दो गज की कही जाती है।
कार्यानुसारेण वेदीप्रयोगमाह —
विवाहेषु च सर्वेषु स्वस्तिका सर्वकामदा।
भद्रा भद्रा नरेन्द्राणां सर्वकल्याणकारिका ॥ 17 ॥
देवतास्थापने चैव स्वस्तिका भद्रा श्रीधरी।
देवानां च प्रतिष्ठादौ पूजायां चैव पद्मिनी ॥ 18 ॥
सभी प्रकार के वैवाहिक और माङ्गलिक कार्यों के लिए स्वस्तिका वेदी समस्त
कामनाओं को पूरी करने वाली कही गई है। भद्रा वेदी राजाओं के लिए सर्वप्रकारेण
कल्याणकारक है। देवी-देवताओं के स्थापना कार्य में स्वस्तिका, भद्रा, श्रीधरी वेदी
उचित रहती है और देवताओं की प्रतिष्ठादि या पूजा का कार्य हो तो पद्मिनी वेदी
उचित ही मानी गई है।¹
सिंहासनं तदूर्ध्वे च भद्रासनमथापि वा।
पट्टप्रस्तारिका चैवं गदिकाद्यं तथोत्तरे ॥ 19 ॥
प्रयोजन के अवसर पर वेदिका के ऊपर सिंहासन अथवा भद्रासन लगाया जाए
जिस पर महीन चद्दर से ढकी हुई गद्दी उत्तर मुखी लगी हो।
अन्यदप्याह —
चतुःस्तम्भसमायुक्तं छाद्यत्रयविभूषितम्।
ऊर्ध्वे च घण्टाकलशं मत्तवारणशोभितम् ॥ 20 ॥
वेदी के चारों ओर चार स्तम्भों से युक्त तीन चन्दोवे तने हुए हों जिन पर घण्टा,
कलश युक्त मत्तवारणों की शोभा होनी चाहिए।
- सिद्धान्तशेखर में आया है कि वेदियाँ चतुरस्र, पद्मिनी, श्रीधरी व सर्वतोभद्रा होती हैं। दीक्षा, स्थापनादि
अवसरों पर चतुरस्रा का प्रयोग सर्वफलप्रद होता है। तड़ागादि की प्रतिष्ठा के अवसर पर पद्म के आकार
वाली पद्मिनी का प्रयोग होगा। राज्याभिषेक के अवसर पर चतुर्भद्रा का प्रयोग होगा, विवाह में श्रीधरी
का प्रयोग होगा जो कि बीस कोष वाली, दर्पणोदर जैसी समस्तरीयता लिए होंगी : वेदी चतुर्विधा प्रोक्ता
चतरस्रा च पद्मिनी। श्रीधरी सर्वतोभद्रा दीक्षासु स्थापनादिषु ॥ चतुरस्रा चतुःकोणा वेदी सर्वफलप्रदा।
तड़ागादिप्रतिष्ठायां पद्मिनी पद्मसंन्निभा॥ राज्ञां स्यात्सर्वतोभद्रा चतुर्भद्राभिषेचने। विवाहे श्रीधरी वेदी
विंशत्यस्रसमन्विता॥ दर्पणोदरसङ्काशा निष्प्रोन्नत विवर्जिता। (कुण्डरत्नावली : सम्पादक- मिताली देव,
वाराणसी, 2003 ई. पृष्ठ 19)