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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 535 में से

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पृष्ठ 486

सूत्र-७६ 441
बुधे यमे च गन्धर्वे तद्रूपा च द्वितीयका।
शोषे क्षये च रोगे च कोष्ठागारं तथादिमम् ॥ ३२ ॥
जिनका मुख उत्तर-दक्षिण दिशाओं की ओर बनाना प्रशस्त कहा गया है, जो
सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है और सौम्य वास्तु पद के अन्त में हस्तिनिवेश
अर्थात् गजशाला (हाथी के ठाण) हो और उसके द्वार के परे दूसरी ओर दक्षिण दिशा
के वास्तुपद विन्यास के बुध, यम और गन्धर्व पद भाग पर भी वैसा ही दूसरा द्वार भी
उसी के अनुरूप बनाए और वास्तुपद विन्यास के शोष, पापयक्ष्मा और रोग के पद
भाग पर बड़ा-सा कोठार बनाएँ जो आरम्भ से ही भरा-पूरा भण्डार गृह हो।
पित्रिमृगभृङ्गेषु च कोष्ठागारं द्वितीयकम्।
गोष्ठागारं कार्यमित्थं प्रोक्तं च विश्वकर्मणा ॥ ३३ ॥
इसी तरह से वास्तुपद विन्यास के दक्षिण-पश्चिम कोण में स्थित पितर, मृग,
और भृङ्ग पद भाग पर भी दूसरा वैसा ही विशाल कोठार या भण्डारगृह बनाएँ।
उसी के पास ऐसा ही गोठ (आमोद-प्रमोद हेतु गोष्ठागार) भी बनाया जाना
चाहिए— ऐसा भगवान् विश्वकर्मा¹ ने कहा है।
ईशादितिदितिषु च भाण्डागारमापार्धतः।
पुष्पागारं सवित्रर्धे ह्याग्नौ भृत्यान्तरिक्षयोः ॥ ३४ ॥
तृणशाला प्रकर्तव्या प्रशस्ता शुभकर्मणा।
पूर्वोक्त वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के उत्तर-पूर्वी कोण पर स्थित ईश, दिति और
अदिति के पद भाग पर बड़ा भाण्डागार अर्थात् भण्डार बनाए जाए। उत्तर-पूर्व
कोण पर आप के पद के आधे भाग पर पुष्पागार और दक्षिण-पूर्व के सवित्र-पद
के आधे में, अग्नि, भृत्य और अन्तरिक्ष पद भाग पर तृणशाला बनाई जाए, जो सभी
शुभ कार्यों में प्रशस्त कही गई है।
पर्जन्ये चाधिकरणं राज्ञः कार्यं पराङ्मुखम् ॥ ३५ ॥
शुभा प्रतोली माहेन्द्रे जये श्रीकरणादिकम्।
आदित्ये वप्रकरणं सम्मुखं श्रीकरादिषु ॥ ३६ ॥
धर्माधिकरणं सत्ये कर्तव्यं चापराङ्मुखम्।
वास्तुपद विन्यास के पूर्व की ओर पर्जन्य के पद पर अधिकरण हो, राजा का
कार्य पराङ्मुख होगा। माहेन्द्र पद पर सुन्दर प्रतोली होगी। जय के पदस्थान पर

  1. यहाँ ग्रन्थकार आद्य विश्वकर्मा के ग्रन्थ का स्मरण करता है। सम्भवतः यह ग्रन्थ विश्वकर्मप्रकाश हो
    अथवा विश्वकर्मीय शिल्पशास्त्र हो। समराङ्गण में भी राजनिवेश में ऐसा निर्देश आया है।