अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 482, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७६ 437
सिंहासनसमायुक्ता याम्यस्था चोत्तरानना।
सिंहावलोकनयुक्ता महाराजसभा भवेत् ॥ 10 ॥
इसी तरह मैत्रपद के पश्चिमी भाग में उत्तराभिमुख सिंहासन से युक्त सजी हुई
ऊँचे सिंहावलोकनयुक्त अर्थात् बड़े-बड़े, विशाल झरोखों वाली महाराज सभा का
निर्माण कराना चाहिए।
सभामध्ये तु कर्तव्यं वेद्यां सिंहासनं महत्।
श्रीधरोद्भवमाडं च सुवर्णरत्नभूषितम् ॥ 11 ॥
सभा भवन के मध्य भाग में ऊँची वेदिका बनाकर उस पर बृहद् सिंहासन की
स्थापना करें। उस पर स्वर्ण, रत्नादिकों से भूषित श्रीधर नामक माड़ की रचना
होगी।
ब्रह्मस्थानार्धतः स्तम्भैः सिंहद्वारं गर्भोत्तरे।
याम्योत्तरे तु कर्तव्या गजयुधा गजोत्तमाः ? ॥ 12 ॥
इसके बाद, ब्रह्मस्थान के आधे भाग से उत्तर की ओर बीचो-बीच सिंहद्वार,
बनाएँ और ब्रह्मद्वार के बने सिंहद्वार के उत्तर-दक्षिण दोनों भागों में अच्छे बलवान
हाथियों की लड़ाई करने के गजयुध के अग्गड़ बनाए जाए, जहाँ हाथियों की
नियमित बल परीक्षा हो सके।
तदग्रे चाट्टालकानि प्राकारे स्याद्रथाकृतिः।
राजगृहाद् द्वे प्रतोल्यौ प्राकारान्तर्विनिर्गते ॥ 13 ॥
उन गजयुधों अर्थात् हाथियों के लड़ाई के अग्गड़-ठाणों के आगे ऊँची-ऊँची
अट्टालिकाएँ बनाई जाए जिनकी दीवार की आकृति रथ के समान हो अर्थात् उनसे
चारों ओर फिर करके हाथियों की लड़ाई देखने का मनोरञ्जन हो सके। उन्हीं
अट्टालिकाओं के प्राकारान्त से लगी राजगृह कीं ओर से आती हुई मार्ग पर दो बड़ी
पोलें कुछ आगे की ओर निकली हुई बनानी चाहिए।
राजमातुः पट्टराज्ञ्याः प्राकारो गृहतो भवेत्।
सिंहद्वारसमानान्त्यनेकद्वाराणि कारयेत् ॥ 14 ॥
जहाँ से राजमाता, पटरानियाँ आदि प्राकार, परकोटे पर बने हुए गृहों से
सिंहद्वार के समान बने हुए अनेक झरोखों के द्वारों से यह गजयुद्ध का मनोरञ्जन देख
सके।
विवस्वत् पृथ्वीधरार्धे प्राकारः पूर्वनिर्गतः।
ब्रह्मणोऽन्ते तु प्राकारो जयद्वारं गर्भोत्तरे ॥ 15 ॥