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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 535 में से

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पृष्ठ 471

426 अपराजितपृच्छा
अथात्र प्रशंसामाह —
अन्नं तत्र दयाहेतु भोगलिङ्गं महीतले।
निग्रहानुग्रहे शक्तः स भवेत् पृथिवीपतिः ॥ 7 ॥
अस्तु, इस महीतल पर जो भी व्यक्ति अन्न का संग्रह करने और उस राशन का
अनुग्रहपूर्वक जनता में दया करके भोग कराने में समर्थ होगा, वही यहाँ का
पृथ्वीपति अर्थात् राजा के समान माननीय होगा।
गृहे वा नगरे ग्रामे आधिपत्यं च दुर्लभम्।
किं पुना राज्यलब्धौ तु चाधिपत्यं महीतले ॥ 8 ॥
अरे, इस बात को समझो कि जब व्यक्ति को अपने घर में, नगर में या ग्राम में
भी आधिपत्य मिलना दुर्लभ है, तो फिर इस भूमि पर महीतल पर राज्य-शासन
पाना और आधिपत्य कर पाना कितना महत्त्वपूर्ण है !
राज्यार्थं धार्यते शस्यं शस्यार्थं तु जलाशयः।
भूमिर्भागपरीक्षार्थं सूत्रधारं परीक्षयेत् ॥ 9 ॥
अस्तु, ऐसा राज्याधिकार पाने के लिए सदा अन्न संग्रह करके उस पर
अधिकार रखना चाहिए और इस अन्नोत्पादन कार्य को बढ़ाने के लिए जगह-जगह
जलाश्रयों की व्यवस्था करनी चाहिए। इन जलाशयों के लिए उपयुक्त भूमि भाग की
परीक्षा हेतु सदा सूत्रधार शिल्पी, गजधर या शिल्पशास्त्रों के ज्ञान की सेवा लेना
चाहिए कि वह सूत्रधार शास्त्र ज्ञान सम्पन्न हैं भी या नहीं?1
प्रजाहीनो ध्रुवं वत्स राजा दुःखस्य भाजनम्।
शेषं भुङ्क्ते महादुःखे विषये स्वेऽपराजित ॥ 10 ॥
इस तरह यह पाया गया कि प्रजा का आधार अन्न है और राजा, जलाशय और
अन्न— इन तीनों का आधार सूत्रधार का शिल्पज्ञान है जिससे वह भूमिजल को
उपलब्ध कराता है। इसके अभाव में राज्य प्रजाहीन हो जाता है। हे वत्स! यह राजा
के लिए भी बड़े दुःख की बात होगी और वहाँ रहने वाले जो शेष जन समुदाय
होंगे, वे भी महान् दुःख भोगेंगे।

  1. काश्यपीयकृषिसूक्ति में आया है कि भूमि की शुभाशुभता की परीक्षा के लिए ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त
    किया जाना चाहिए जो कि गुणों, लक्षणों के आधार पर उसका वर्गीकरण करने की पर्याप्त दक्षता रखते
    हों। भूमिविद् चाहे ब्राह्मण हो, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हो, उनके लिए यह भी आवश्यक है कि वे
    भूमिगत जलानुसन्धान की विधियों के ज्ञाता हो और कृषिशास्त्र विशारद भी होने चाहिए—
    भूपरीक्षाक्रविदो गुणाढ्या नृपचोदिताः ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वापि विशः शूद्रास्तु वा पुनः। दकार्गल
    प्रमाणज्ञाः कृषिशास्त्रविशारदाः ॥ (काश्यप. 2, 46-47)