अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७३ 413
और दण्डपुर अतिदीर्घ होते हैं। श्रीपुर के एक प्राकार, एक परकोटा होता है जबकि
रिपुमर्दन पुर के दो प्राकार या दो परकोटे होते हैं।
शैलकुक्षौ तथा स्राहं दिव्यकं शैलमस्तके।
नद्युत्तरे च सौम्याख्यं सरिद्याम्ये तु धर्मकम्॥ 8 ॥
स्राह पुर पहाड़ी के तले में होता है और दिव्य पुर पहाड़ी के सिर पर होता है।
सोम नामक पुर नदी के उत्तर की ओर तथा धर्म पुर नदी के दक्षिण में होता है।
कमलं पश्चिमे नद्या नद्याः पूर्वे तु शक्रदम्।
पौरुषं पुरुषाकारं नद्योश्चैवं महाजयम्॥ 9 ॥
कमल नामक पुर नदी के पश्चिम में और शक्र नामक पुर नदी की पूर्व दिशा में
होता है। पौरुष नामक पुर पुरुषाकृति का और महाजय पुर नदियों के मध्य में स्थित
होता है।
पुरस्य फलाफलमाह -
पुरं विंशतिसङ्ख्याकं रम्यं सुरनरोरगैः।
स्वस्तिशान्तिकरं नित्यं गो-ब्राह्मण-धराभुजाम्॥ 10 ॥
ये विंशति संख्यात्मक पुर सुर-नर और नाग जाति के लोगों को शान्ति और
खुशहाली लाने वाले हैं और नित्य गौ, ब्राह्मण और राजाओं को सुखप्रद हैं।
माहेन्द्रं चतुरश्रं च प्रतापकीर्तिवर्द्धनम्।
वृद्धदं सर्वतोभद्रं नित्यं तद्गदशान्तिदम्॥ 11 ॥
सिंहावलोकनं रम्यं हरे (ते) रिपुरिषाव (त) धी(वी)?।
वारुणे तु प्रजावृद्धिर्नन्दाख्ये नन्दनं चिरम्॥ 12 ॥
इनमें माहेन्द्र नामक पुर चौकोर होता है और वह वहाँ रहने वाले लोगों की
कीर्ति में अभिवृद्धि का कारक होता है, उनके यशः प्रताप को बढ़ाने वाला होता है।
सर्वतोभद्र नामक पुर भी सदैव शुभ होता है और रिपुओं का नाश करने वाला तथा
वारुण नामक पुर प्रजा वृद्धिकारक, और नन्द नामक पुर सदा आनन्ददायी होता है।
नन्द्यावर्तं मङ्गलाख्यं त्रिदशानां च पुष्पकम्।
स्वस्तिकृत्स्वस्तिकं प्रोक्तं जयन्तं च जयावहम्॥ 13 ॥
नन्द्यावर्त पुर मङ्गलकारी है और पुष्पक संज्ञक पुर देवताओं को भी मङ्गलकारी
कहा गया है। स्वस्तिक पुर सदा स्वस्तिकारक होता है और जयन्त नामक पुर सदा
जय कराता है।