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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 430, कुल 535 में से

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पृष्ठ 430

सूत्र-७० 385
एक-द्वि-त्रिक्रमात्प्रोक्ताश्छन्दाश्च विबुधैर्युताः।
मर्त्यलोकेषु सम्प्राप्ताः स्वर्गपातालभूषणाः ॥ ९ ॥
एक, दो और तीन क्रम से विद्वान शिल्पशास्त्रियों ने छन्द कहे हैं जो मृत्युलोक,
स्वर्गलोक और पाताललोक में भूषण रूप में माने गए हैं।
चतुरश्रं समं क्षेत्रमायव्ययविशोधितम्।
आदिगर्भं प्रकुर्वीत भुजकर्णविशोधितम् ॥ १०॥
चौकोर क्षेत्र को समतल करके उसके आय और व्यय को शोधित करें, फिर
भुजाओं के कोनों से शोधित कर्ण रेखाओं से आदिगर्भ निश्चित करें।
भाजयेदष्टभागांस्तु आयामं विस्तरं समम्।
एकांशं च त्रिधा कृत्वा चोभयोश्च समन्ततः ॥ ११॥
तदनन्तर आयाम को आठ से भाग दें और उसी के समान विस्तार को भी आठ
से भाग दें। फिर, जो एकांश आए उन्हें तीन-तीन भागों में दोनों के रख दें अर्थात्
आयाम के तीन और विस्तार के तीन भाग होंगे।
मध्यकोष्ठं परित्यज्य अष्टसद्मेश्च जायते ?।
पूर्वापरे च द्वाराणां याम्यकौबेरसंस्थितौ ? ॥ १२ ॥
इस तरह मध्य कोष्ठ को छोड़ने पर आठ घर बन जाते हैं जिससे पूर्व-पश्चिम
के द्वार और उत्तर-दक्षिण के द्वार बन जाते हैं।
सर्वेषामीदृशं छन्दश्रुतुःषष्टिदेषु च।
ब्रह्मस्थाने गृहाश्चैव पादानां च चतुष्टये ॥ १३ ॥
इसी तरह चौंसठ पदों के छन्दों में भी ऐसे ही बनते है, केवल उनके गृहों के
ब्रह्मस्थान में चार पाद होते हैं।
गृहाणां गृहसङ्ख्या च द्वात्रिंशद्भिः करैर्मता।
ब्रह्मवंशयोर्द्वयोश्च चतुर्थांशकराः स्मृताः ॥ १४ ॥
उनमें गृहों की बत्तीस गज की गृह संख्या बनती है और ब्रह्म अंश के दो पद
चतुर्थांश गज माने गए हैं।
चत्वरे द्वादशमार्गांश्चत्वरे षोडशान्विताः।
नवमार्गकृता सङ्ख्या निर्मिता विश्वकर्मणा ॥ १५॥
इनके चारों ओर बारह मार्ग और चारों ओर सोलह मार्ग या चारों और नौ मार्ग
रखना चाहिए-इस संख्याक्रम को विश्वकर्मा ने निर्धारित किया है।