अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें374 अपराजितपृच्छा
इसी प्रकार उद्दिष्टछन्द के क्रम में इष्ट संख्या को स्थापित करें, पुनः उसको
समान रूप से विभाजित करे। रूप वाली संख्या लघु स्वरूप के दलन में आधे
सहित एक में जब गुरु बन जाए और इष्टपद की प्राप्ति हो जाए और सारे लघु हो
जाए तब अलिन्द का उदय होता है अर्थात् लघु स्वरूप में बाँटने पर आधे गुरु करते
हुए जब तक इष्ट पद न आए तब तक लघु अलिन्द बनते जाएँगे।
कृत्वा छन्दः समुद्दिष्टं तदन्ते लघुनि द्विकम्।
न्यसेदेकं गुरूणां च द्विगुणं द्विगुणं ततः॥ 53॥
व्यत्ययाल्लघुनः स्थाने द्विगुणादेककं गुरोः।
कुर्यात् तमाद्यस्थानाङ्कसङ्ख्यं नष्टे गृहं भवेत्॥ 54॥¹
इत्युद्दिष्टनष्टछन्द।
इसी प्रकार चाहा गया छन्द करके उसके अन्त में दो लघु रखें फिर एक गुरु
रखे फिर उनको दुगुना-दुगुना करते जाए। फिर लघु के स्थान पर दुगुने युक्त को
परस्पर रखे फिर उसको आद्य संख्या स्थान तक ले तो इसे नष्ट गृह कहते हैं।
आशय यह है कि छन्द को समुद्दिष्ट करके अन्त लघु में एक जोड़ा न्यस्त करें, फिर
दुगुना-दुगुना गुरुओं को विन्यास कर फिर इस क्रिया को पलट दे, लघु के स्थान में
एक गुरु रखे तो नष्ट में आदि संख्या वाला गृह कहलाता है।
प्राक्स्यैकं कोष्ठमेकैकवृद्ध्या न्यस्येदूर्ध्वं पङ्क्त्यो यावदिष्ट्राः।
इष्टानेकार्दींलिखेदानुपूर्व्या कर्णेनाधः शून्यरूपे च दद्यात्॥ 55॥
कोष्ठक में एक रखकर एक-एक कोष्ठक में वृद्धि करते जाए; यह ऊपर की
पङ्क्ति में रखते जाएँ जब तक की इष्ट की प्राप्ति न हो जाए, एकादि से इष्टों को
लिखकर अनुपूर्व कर्ण के नीचे शून्य रूप में लिखें।
कर्णस्थाङ्कश्लेषतोऽङ्के भवेद् यस्तं विन्यस्येत् कोष्ठकेषु क्रमेण।
उद्दिष्टाङ्को भद्रसङ्ख्यानि मध्ये याभ्यः कर्णश्लेषतो मूषिकास्ताः॥ 56॥
एकादिषु द्विगुणितेष्विहः यावदिष्टमूषाक्रमव्युपहितेष्वथ तेषु विद्यात्।
उद्दिष्टवेश्मकृतनिर्गममार्गमूषासत्काङ्कसैकयुतिनिर्मितसङ्ख्यमोकः॥ 57॥²
- तुलनीय- कृत्वा छन्दः समुद्दिष्टं तदन्ते लघुनि द्विकम्। न्यसेदेकं गुरूणां च द्विगुणं द्विगुणं ततः॥
व्यत्ययाल्लघुनः स्थाने द्विगुणादेककं गुरोः। कुर्या तमाद्यस्थानाङ्कसङ्ख्यं नष्टे गृहं भवेत्॥ (समराङ्गण. 26,
76-77) - ये श्लोक समराङ्गणकार के हैं। तुलनीय- प्राक्स्यैकं कोष्ठमेकैकवृद्ध्या न्यस्येदूर्ध्वं पङ्क्तयो यावदिष्ट्राः।
इष्टानेकादींलिखेदानुपूर्व्या कर्णेनाधः शून्यरूपे च दद्यात्॥ कर्णस्थाङ्कश्लेषतोऽङ्के भवेद् यस्तं विन्यस्येत्
कोष्ठकेषु क्रमेण। उद्दिष्टाङ्को भद्रसङ्ख्यानि मध्ये याभ्यः कर्णश्लेषतो मूषिकास्ताः॥ एकादिषु द्विगुणितेष्विह