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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 535 में से

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पृष्ठ 416

सूत्र-६८ 371
हो जाता है, पुनः इच्छित क्रिया-परिकल्पनाओं की वैकल्पिक संख्या अन्त की पङ्कि ,
में मिल जाती है।¹
अथ खण्डमेरु वर्णनं —
खण्डमेरुं तु विन्यस्येत् तद्वदेवैकपार्श्ववतः ।
प्रवृद्धैः कोष्ठकैस्तत्राप्यङ्काः प्राग्वत् फलं यथा ॥ 41 ॥
अब खण्डमेरु के लिए कहते हैं कि उसी प्रकार से पार्श्व से खण्डमेरु का
विन्यास करना चाहिए। उसके कोष्ठक प्रवृद्ध हों और अङ्क दूसरी पङ्कि में छोर तक,
पहलों में शून्य रखें और अन्य कोष्ठों में भी पूर्व की भाँति, फल में भी वैसा ही करें।
तथा चान्यं खण्डमेरु (पताकाच्छन्दश्च) —
अथापरः खण्डमेरुः कोष्ठांस्तत्रेष्टसङ्ख्यया ।
कृत्वैकापचितान् वामविभागापचितानधः ॥ 42 ॥
इसके उपरान्त, दूसरे खण्डमेरु के विषय में कहा जा रहा है। वहाँ पर कोष्ठों
को आठ की संख्या में रखना चाहिए। इस प्रकार इसमें नीचे से ऊपर कोष्ठ आठ
होते हैं। इसके बाद (सम्भवतः पताका छन्दार्थ) एक-एक कम करते हुए नीचे के
बायें भागों में भी कमी करते जाएँ।
एकाद्येकोत्तरानङ्कानाद्यपङ्क्तौ निवेशयेत् ।
अन्यासु पङ्क्तिष्वाप्रान्तं शून्यानाद्येषु कल्पयेत् ॥ 43 ॥
द्वितीयेषु च कोष्ठेषु तासामेकैकं साधयेत् ।
द्वितीयायां तृतीयादिकोष्ठकेषु यथाक्रमम् ॥ 44 ॥
विकर्णयोगजानन्यानूर्ध्वाधोयोगसम्भवान् ।
फलं विकर्णयोगात्थमेकस्मिन् परिकल्पयेत् ॥ 45 ॥²

  1. यह मत समराङ्गणसूत्रधार से प्रेरित है। इसे इस तरह भी स्पष्ट किया जा सकता है—आगे से आगे एक
    एक कोष्ठों को इच्छानुसार विन्यसित करें, आदि से प्रारम्भ कर तदनन्तर बढ़ते जाएँ, जब तक दोनों
    पार्श्वों का एक समान सम्पादन हो जाए तब मेरुछन्द निष्पन्न होता है। मेरु की एक से अधिक संख्या
    होती है और शराव के सदृश्य उसकी आकृति होती है। प्रथम कोष्ठ का जो रूप होता है, वही पार्श्वों का
    रूप बन जाता है। ऊर्ध्वस्थित इन दोनों के मध्य में पृथक् सङ्कलित रूप हो जाता है, दुबारा इच्छित
    क्रिया कल्पनाओं की संख्या अन्तिम पङ्क्ति से संयुक्त हो जाती है— एकाद्येकोत्तरान् कोष्ठान्
    विन्यसेदिच्छयात्मनः। आद्यादारभ्य तद्वृद्धिर्यथा स्यात् पार्श्वयोः समम्॥ मेरोरेकाधिका सङ्ख्या शरावस्येव
    चाकृतिः। प्रथमे कोष्ठके रूपमन्तं यावच्च पार्श्वयोः॥ आसनोर्ध्वस्थयोर्नास्येन्मध्ये सङ्कलितं पृथक्।
    तस्मिंस्त्रिंशद्विकल्पनां सङ्ख्या स्यादन्त्यपङ्क्तिगा॥ (समराङ्गण. 26, 61-63)
  2. ये श्लोक ज्यों के त्यों समराङ्गण. में आए हैं— खण्डमेरुं तु विन्यस्येत् तद्वदेवैकपार्श्वतः। प्रवृद्धैः
    कोष्ठकैस्तत्राप्यङ्काः प्राग्वत् फलं तथा॥ अथापरः खण्डमेरुः कोष्ठांस्तत्रेष्टसङ्ख्यया। कृत्वैकापचितान्