अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६८ 369
छन्दस्य पुराख्यानमाह —
मृत्युभीतैः पुरा देवैरात्मनश्छन्दनायकः ।
संस्मृतानीह छन्दांसि छादितैस्तैस्ततो ¹महीः ॥ ३२ ॥
पूर्वकाल में मृत्यु के भय से आक्रान्त देवताओं ने अपने छन्दनायक के पास
जाकर इन छन्दों का स्मरण दिलाया था। तब उसने इनको छाया देकर इस भूमि पर
रहने के योग्य बनाया।
छन्दे-छन्दं समुद्दिष्टं वाससी कृतिरेव च।
छन्दोभिरावृतं सर्वं वन्द्यं सर्वत्र नान्यथा ॥ ३३ ॥
तब छन्दों में छन्दों का प्रयोग करते हुए भवनों का निर्माण करके उन्हें उन्नत
किया। अस्तु, सर्वत्र वे सभी छन्दों से आवृत्त होकर वन्दनीय बन गए, इसमें कोई
भी बात अन्यथा नहीं है।
व्योम्नः पतते बिन्दु ?पतितो स बिन्दुगर्भातो भवेत्।
गुरुर्लघुर्लतायाश्च तस्य चाष्टौ समुद्भवाः ॥ ३४ ॥
व्योम से जो बिन्दु भूमि पर गिरता है,