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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 411, कुल 535 में से

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पृष्ठ 411

366 अपराजितपृच्छा
तथैक-त्रि-पञ्च-सप्त-नवशाखसमुद्भवम्।
प्रयुक्तं द्वारविधानं वास्तूपदेशका विदुः ॥ 14 ॥
प्रासादों के द्वार पर बनने वाली रेखाएँ एक, तीन, पाँच, सात, नौ शाखा तक
बनती है, ऐसा विद्वान वास्तुशास्त्रोपदेशकों ने द्वार-विधान में प्रयुक्त किया है।
अथ मण्डपानि —
गूढो नृत्यश्चन्द्रालोको भद्रावलोकनादिकाः।
चतुःषष्टिः⁶⁴ समाख्याता मण्डपा मेरुछन्दतः॥ 15 ॥
अब मण्डपों के बारे में कहता हूँ जो गूढ मण्डप, नृत्य, चन्द्रावलोकन,
भद्रावलोकन आदि नामों से चौंसठ प्रकार के मेरुछन्द से बनने वाले कहे गए हैं।
वितानानि —
पद्मनाभिसभामार्गमन्दारभिन्नमिश्रकम्।
षड्विधं च वितानं स्यान् मेरुच्छन्दादुदाहृतम्॥ 16 ॥
इसी तरह सभामण्डपों के वितान भी यथा— पद्म, नाभि, सभा-मार्ग, मन्दार,
भिन्न, मिश्रक ये छह प्रकार के वितान मेरुछन्दानुसार बनते हैं।
शाला नामानि —
कर्णजा भ्रमजाश्चैव भद्रजा गर्भजास्तथा।
मध्यजाः पार्श्वजाः ख्याताः शालाश्च मेरुछन्दतः॥ 17 ॥
कर्णजा, भ्रमजा, भद्रजा, गर्भजा, मध्यजा, पार्श्वजा नाम वाली शालाएँ भी
मेरुछन्द से बनती हैं।
पीठानि —
वेदीबन्धं श्रीबन्धाख्यं पङ्कजं भद्रकं तथा।
सुभद्रं तारकं पीठं मेरुच्छन्दोविनिर्गतम्॥ 18 ॥
इसी प्रकार वेदीबन्ध, श्रीबन्ध, पङ्कज, भद्रक, सुभद्र और तारक इन नामों की
पीठ भी मेरुछन्द से ही निकली हुई है।
विविध लिङ्गनामानि —
सुरार्चितं चाद्यनादि स्वभु बाणं चतुर्थकम्।
शक्त्याख्यं वर्धमानं च लिङ्गं मेरुविनिःसृतम्॥ 19 ॥
सुरार्चितलिङ्ग, आद्यनादिलिङ्ग, स्वभुलिङ्ग, बाणलिङ्ग, शक्त्यालिङ्ग और
वर्धमानलिङ्ग नाम के लिङ्ग भी मेरुछन्द से बने हैं।