अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५४ 287
वे कहने लगे कि हे प्रभु! यदि आप हम पर तुष्ट हो गए हो तो कृपा करके
आप सत्य रूप में प्रकट होकर हमें ऐसा ज्ञान दें, जो अवृथा हो, अचूक हो। तभी
सुर और असुरों के द्वारा वध्य होने की आज्ञा का लोप हो सकता है।
शास्त्रच्छेदो न च भवेत् म्रियते न तथोदके।
अग्निदेवात्समुत्पन्नो ह्यवन्ध्यो देवदानवैः ॥ 14 ॥
तब न तो कोई शस्त्र से छेदन या मारण होगा न ही जल में डुबोकर मारना
सम्भव होगा क्योंकि अग्निदेव से समुत्पन्न होने से देव-दानव सभी से अवध्य ही है।
ईश्वर उवाच —
शृणु भार्गव दैत्येन्द्र विद्याप्रस्तारनिर्णयम्।
त्रिषु स्थानेषु प्रस्तार्य्य गुरुस्थाने नियोजितः ॥ 15 ॥
ईश्वर ने कहा कि हे भार्गव दैत्येन्द्र सुनो ! हमारा विद्या प्रस्तार निर्णय यह है कि
तीन स्थानों में प्रस्तार करके हम तुम्हें गुरु स्थान में नियोजित करते हैं।
अविद्यागुरुलब्धाऽङ्गदोषपापानुसङ्ग्रहे।
ज्ञानोन्मीलनं तद्भक्त्वा विद्यासिद्धिश्च वृद्धतः ॥ 16 ॥
अविद्यागुरु, लोभी-अङ्गदोषी और पाप की कमाई से संग्रह करने वाले इन
तीन प्रकार के गुरुओं से ज्ञान उन्मीलन होगा तब तुम्हारी भक्ति से विद्यासिद्धि भी
बढ़ेगी।