अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५३ 281
पर्वतों के पङ्ख काटकर उन्हें अचल करने का यह यज्ञ गङ्गा-यमुना नदियों के
मध्य के भूभाग में आरम्भ हुआ था¹ जिसमें वज्रायुध के प्रयोग से सुरों ने यज्ञ की
रक्षा की और दैत्यों को जीता।
असुराश्च ततः सर्वे चिन्तातुरतया स्थिताः ।
नैर्ऋत्ये कुण्डसम्भूतं ²भार्गवोरुशक्त्यात्मकम् ॥ २२ ॥
दैत्यों और असुरगण भी सभी चिन्तातुर होकर नैर्ऋत्य कुण्ड से सम्भूत होने
वाले उशना पुत्र भार्गव की शरण में गए।
दुर्जयं दुर्निरीक्ष्यं च महोघोरं सुदारुणम्।
स्फुरन्तं विद्रुमाकारं लोचनैरग्निसन्निभैः ॥ २३ ॥
उन असुरों की पुकार और दुर्जय दुर्निरीक्षा अर्थात् देवताओं को जीतना कठिन
देखकर भार्गव को महाघोर क्रोधावेश हुआ। वह महादारूण, भयानक रूप में
फुफकारने लगे और अपनी आँखों में क्रोधाग्नि से मानो लाल चिनगारियाँ-सी
निकालने में लगे।
हुताशनगर्भसम्भूतं प्रलयान्तसमप्रभम् ।
स्फुरत्स्फुलिङ्गं ज्वलन्तं दुर्निरीक्ष्यं भयप्रदम् ॥ २४ ॥
उस समय उनका यह भयप्रद रूप ऐसा लग रहा था मानो अग्नि के गर्भ से ही
प्रलयाग्नि के समान प्रभावाली जलती मशाल से उठती हुई स्फुलिंगों, चिनगारियाँ
को देखना भयभीत होने का कारण बनता है।
त्रिनेत्रं विकृतं रौद्रं जटिलं वाललोहितम्।
दंष्ट्राकरालमत्युग्रं मुखे दावाग्निसन्निभम् ॥ २५ ॥
उस समय भार्गव का विकराल रूप, त्रिनेत्र, संहारक शिव के त्रिनेत्रों के समान
रौद्र और जटिल तेज लाल वर्ण वाला होकर अति उग्र कराल दाँतों-दाढ़ों वाला था
और मुख से दावाग्नि की ज्वालाएँ निकलती थीं।
कृतान्ततुल्यं दशनैश्चण्डोष्ठकपुटान्तरे।
भूतलान्ते तलं तस्य आलोके बाहुपञ्जरम् ॥ २६ ॥
उनके दाँत यमराज की दाढ़ों की भाँति भयानक थे जो होठों की विशालता में
और भी भयानक लग रहे थे। उनकी काया इतनी विशाल हो गई थी कि उनके पाँव
- गङ्गा-यमुना के मध्य में यज्ञ होने की अवधारणा शतपथ ब्राह्मण सम्मत है। कभी इस क्षेत्र में बहुत-से
पेड़ थे जिनका संहारकर भूमि को यज्ञकर्म योग्य बनाया गया था। - 'भार्गवा रूशनात्मकं' पाठ स्यात्। 'भागीवेषु शक्त्यात्मकम्' मिति 'न' पाठः।